क्षितिज भाग 2 (काव्य खंड) 1. सूरदास के पद कवि परिचय: सूरदास भक्ति काल के सगुण धारा के कृष्ण भक्ति शाखा के प्रतिनिधि कवि हैं। इनका जन्म 1478 ईस्वी में रुनकता नामक गाँव में हुआ माना जाता है। ये वल्लभाचार्य के शिष्य थे और अष्टछाप के कवियों में प्रमुख हैं। इनकी प्रमुख रचनाएँ 'सूरसागर', 'साहित्य लहरी' और 'सूर सारावली' हैं। पाठ परिचय: प्रस्तुत पद 'सूरसागर' के 'भ्रमरगीत' से लिए गए हैं। इन पदों में गोपियों का कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम, विरह वेदना और उद्धव द्वारा दिए गए योग संदेश के प्रति उनकी प्रतिक्रिया का मार्मिक चित्रण है। गोपियाँ व्यंग्य और उपालंभ के माध्यम से अपनी बात कहती हैं। प्रथम पद: भावार्थ: गोपियाँ उद्धव को 'बड़भागी' (भाग्यशाली) कहकर व्यंग्य करती हैं, क्योंकि वे कृष्ण के सानिध्य में रहकर भी उनके प्रेम से अछूते हैं। वे उद्धव की तुलना कमल के पत्ते और तेल की गगरी से करती हैं, जो जल में रहकर भी जल से निर्लिप्त रहते हैं। गोपियाँ कहती हैं कि यदि उद्धव कभी प्रेम के धागे में बँधे होते तो वे प्रेम की पीड़ा को समझ पाते। मुख्य बिन्दु: उद्धव पर व्यंग्य, गोपियों का कृष्ण प्रेम। द्वितीय पद: भावार्थ: गोपियाँ कहती हैं कि उनके मन की बातें मन में ही रह गईं, क्योंकि कृष्ण ने स्वयं आकर उनसे मिलने का वादा नहीं निभाया। वे कहती हैं कि वे कृष्ण के आने की आस में जी रही थीं, लेकिन अब उद्धव के योग संदेश को सुनकर उनकी विरह अग्नि और बढ़ गई है। वे कृष्ण से अपनी रक्षा की गुहार लगाती हैं। मुख्य बिन्दु: गोपियों की विरह वेदना, कृष्ण से शिकायत। तृतीय पद: भावार्थ: गोपियाँ कहती हैं कि उनके लिए कृष्ण हारिल पक्षी की लकड़ी के समान हैं, जिसे वे दृढ़ता से पकड़े हुए हैं। वे मन, वचन और कर्म से कृष्ण को अपने हृदय में बसा चुकी हैं। उद्धव के योग संदेश को वे कड़वी ककड़ी के समान बताती हैं और कहती हैं कि उन्होंने तो कृष्ण प्रेम का रोग लगा लिया है। वे उद्धव को सलाह देती हैं कि वे यह योग संदेश उन्हें दें जिन्होंने प्रेम नहीं किया है। मुख्य बिन्दु: कृष्ण के प्रति दृढ़ निष्ठा, योग संदेश का खंडन। चतुर्थ पद: भावार्थ: गोपियाँ कहती हैं कि कृष्ण अब राजनीति पढ़ आए हैं और छली हो गए हैं। वे कहती हैं कि एक तो वे पहले से ही चतुर थे, अब गुरु ग्रंथ पढ़कर और बुद्धिमान हो गए हैं। वे उद्धव से पूछती हैं कि कृष्ण जैसा राजा प्रजा पर अन्याय क्यों कर रहा है और धर्म का पालन क्यों नहीं कर रहा है। वे अपना मन वापस पाने की बात करती हैं। मुख्य बिन्दु: कृष्ण के प्रति गोपियों का रोष, धर्म और न्याय पर प्रश्न। भाषा शैली: ब्रजभाषा, गेय पद, व्यंग्य, उपालंभ, उपमा, रूपक, अनुप्रास अलंकार। 2. तुलसीदास: राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद कवि परिचय: गोस्वामी तुलसीदास भक्ति काल के सगुण धारा के राम भक्ति शाखा के प्रमुख कवि हैं। इनका जन्म 1532 ईस्वी में राजापुर (चित्रकूट) में हुआ था। इनकी प्रमुख रचना 'रामचरितमानस' है, जो भारतीय संस्कृति का एक अनुपम ग्रंथ है। अन्य रचनाएँ 'विनय पत्रिका', 'कवितावली', 'दोहावली' आदि हैं। पाठ परिचय: प्रस्तुत अंश 'रामचरितमानस' के बालकांड से लिया गया है। सीता स्वयंवर में राम द्वारा शिव धनुष तोड़ने के बाद परशुराम अत्यंत क्रोधित होकर वहाँ आते हैं। राम, लक्ष्मण और परशुराम के बीच हुए संवाद का यह अंश अत्यंत नाटकीय और व्यंग्यात्मक है। संवाद का सार: परशुराम का क्रोध: शिव धनुष टूटने पर परशुराम अत्यंत क्रुद्ध होते हैं और धनुष तोड़ने वाले को अपना शत्रु बताते हैं। राम की विनम्रता: राम अत्यंत विनम्रता से परशुराम को शांत करने का प्रयास करते हैं और स्वयं को उनका दास बताते हैं। लक्ष्मण का व्यंग्य: लक्ष्मण परशुराम के क्रोध को देखकर उन पर व्यंग्य बाण छोड़ते हैं, जिससे परशुराम का क्रोध और भड़क उठता है। वे बचपन में कई धनुष तोड़ने की बात कहते हैं और इस धनुष को सामान्य बताते हैं। परशुराम की आत्मप्रशंसा: परशुराम अपनी वीरता, फरसे की महिमा और क्षत्रियों के विनाश की बात कहकर लक्ष्मण को डराने का प्रयास करते हैं। वे खुद को बाल ब्रह्मचारी, क्रोधी स्वभाव का और अत्यंत बलवान बताते हैं। लक्ष्मण की निर्भीकता: लक्ष्मण परशुराम की बातों को अनसुना करते हुए लगातार उन पर व्यंग्य करते रहते हैं, जिससे परशुराम और भी उत्तेजित होते हैं। वे कुम्हड़बतिया (कमजोर) नहीं होने की बात कहते हैं। विश्वामित्र का हस्तक्षेप: विश्वामित्र बीच-बचाव करते हैं और राम-लक्ष्मण को बालक समझकर क्षमा करने की प्रार्थना करते हैं। राम का शांत करना: अंत में राम अपने कोमल वचनों और विनम्रता से परशुराम के क्रोध को शांत करते हैं। मुख्य बिन्दु: परशुराम का क्रोध, राम की विनम्रता, लक्ष्मण का वाक्चातुर्य और व्यंग्य, क्षत्रिय धर्म, ब्राह्मण का सम्मान। भाषा शैली: अवधी भाषा, दोहा-चौपाई छंद, वीर रस, रौद्र रस, व्यंग्य, उपमा, उत्प्रेक्षा, अनुप्रास, पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार। 3. जयशंकर प्रसाद: आत्मकथ्य कवि परिचय: जयशंकर प्रसाद छायावाद के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। इनका जन्म 1889 ईस्वी में वाराणसी में हुआ था। इनकी प्रमुख रचनाएँ 'कामायनी' (महाकाव्य), 'आँसू', 'लहर' (काव्य), 'स्कंदगुप्त', 'चंद्रगुप्त' (नाटक), 'आँधी', 'इंद्रजाल' (कहानी संग्रह) आदि हैं। पाठ परिचय: यह कविता 'हंस' पत्रिका के 'आत्मकथा विशेषांक' के लिए लिखी गई थी। इसमें प्रसाद जी ने अपने जीवन के यथार्थ और अभावों को स्वीकार करते हुए आत्मकथा न लिखने के कारणों का उल्लेख किया है। कविता का सार: आत्मकथा न लिखने का कारण: कवि कहते हैं कि उनका जीवन सामान्य और दुखों से भरा रहा है, जिसमें कोई ऐसी महानता नहीं है जिसका वर्णन किया जा सके। वे अपने जीवन की दुर्बलताओं और कमियों को उजागर नहीं करना चाहते। जीवन की पीड़ा: कवि अपने जीवन में मिले धोखों, प्रेम की कमी और अभावों को स्वीकार करते हैं। वे कहते हैं कि उनके जीवन में सुख का क्षण केवल स्वप्न के समान आया और चला गया। दूसरों पर व्यंग्य: कवि उन लोगों पर व्यंग्य करते हैं जो अपनी आत्मकथा में केवल अपनी प्रशंसा करते हैं और दूसरों की बुराई करते हैं। सरलता और विनम्रता: कवि अपनी सरलता और विनम्रता का परिचय देते हुए कहते हैं कि वे अपने जीवन की छोटी-छोटी बातों को उजागर करके दूसरों को हँसी का पात्र नहीं बनाना चाहते। मुख्य बिन्दु: आत्मकथा न लिखने का कारण, जीवन की यथार्थता, अभाव और पीड़ा, विनम्रता, छायावादी शैली। भाषा शैली: खड़ी बोली हिंदी, छायावादी शैली, लाक्षणिकता, प्रतीकात्मकता, मानवीकरण, रूपक, उपमा, अनुप्रास अलंकार। 4. सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला': उत्साह और अट नहीं रही है कवि परिचय: सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' छायावाद के प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। इनका जन्म 1899 ईस्वी में महिषादल (बंगाल) में हुआ था। इन्होंने मुक्त छंद का प्रयोग किया। इनकी प्रमुख रचनाएँ 'परिमल', 'गीतिका', 'अनामिका', 'तुलसीदास', 'राम की शक्ति पूजा' आदि हैं। पाठ परिचय: प्रस्तुत पाठ में निराला की दो कविताएँ 'उत्साह' और 'अट नहीं रही है' संकलित हैं। उत्साह: विषय: यह एक आह्वान गीत है, जिसमें कवि बादलों के माध्यम से क्रांति और नवजीवन का संदेश देते हैं। भावार्थ: कवि बादलों को गरजने और बरसने का आह्वान करते हैं। वे बादलों को क्रांति का प्रतीक मानते हैं, जो समाज में परिवर्तन लाते हैं। बादल गर्मी से त्रस्त धरती को शीतलता प्रदान करते हैं, उसी प्रकार क्रांति भी शोषितों को राहत देती है। वे बादलों को 'बाल कल्पना के से पाले' कहते हैं, जो बच्चों की कल्पनाओं की तरह विस्तृत और विविध होते हैं। मुख्य बिन्दु: बादल क्रांति के प्रतीक, नवजीवन का संचार, शोषितों के प्रति सहानुभूति। अट नहीं रही है: विषय: यह कविता फागुन मास की अनुपम सौंदर्य का चित्रण करती है। भावार्थ: कवि कहते हैं कि फागुन मास की सुंदरता इतनी अधिक है कि वह प्रकृति में समा नहीं पा रही है। पेड़ों पर हरे-भरे पत्ते और रंग-बिरंगे फूल खिल गए हैं। हवा में फूलों की सुगंध फैली हुई है। पक्षी चहक रहे हैं। ऐसा लगता है, जैसे फागुन ने अपने गले में फूलों की माला पहन रखी हो। चारों ओर सौंदर्य और उल्लास का वातावरण है। मुख्य बिन्दु: फागुन मास का सौंदर्य, प्रकृति का उल्लास, मानवीकरण। भाषा शैली: खड़ी बोली हिंदी, छायावादी शैली, ओज गुण, मुक्त छंद, मानवीकरण, उपमा, रूपक, अनुप्रास अलंकार। 5. नागार्जुन: फसल और यह दंतुरित मुसकान कवि परिचय: नागार्जुन (वैद्यनाथ मिश्र) प्रगतिवादी काव्यधारा के प्रमुख कवि हैं। इनका जन्म 1911 ईस्वी में सतलखा (बिहार) में हुआ था। इनकी कविताओं में जनजीवन का यथार्थ चित्रण मिलता है। इनकी प्रमुख रचनाएँ 'युगधारा', 'सतरंगे पंखों वाली', 'प्यासी पथराई आँखें' आदि हैं। पाठ परिचय: प्रस्तुत पाठ में नागार्जुन की दो कविताएँ 'फसल' और 'यह दंतुरित मुसकान' संकलित हैं। फसल: विषय: इस कविता में फसल के बनने में प्रकृति और मनुष्य के श्रम के महत्व को दर्शाया गया है। भावार्थ: कवि कहते हैं कि फसल किसी एक नदी, एक बूंद या एक मिट्टी का परिणाम नहीं है, बल्कि यह अनेक नदियों के पानी, अनेक मिट्टियों के गुण-धर्म, सूर्य की किरणों के प्रकाश और हवा के थिरकन का परिणाम है। सबसे बढ़कर, यह लाखों-करोड़ों किसानों के हाथों के श्रम का फल है। फसल प्रकृति और मनुष्य के सहजीवन का प्रतीक है। मुख्य बिन्दु: फसल निर्माण में प्रकृति और श्रम का योगदान, प्रकृति से जुड़ाव। यह दंतुरित मुसकान: विषय: इस कविता में एक शिशु की दंतुरित मुसकान का मनोहारी चित्रण किया गया है। भावार्थ: कवि एक शिशु की मुसकान को देखकर अत्यंत मोहित हो जाते हैं। वे कहते हैं कि शिशु की मुसकान इतनी सुंदर है कि वह मृतक में भी जान डाल दे। धूल-धूसरित शिशु का शरीर ऐसा लगता है जैसे कमल के फूल तालाब छोड़कर झोपड़ी में खिल गए हों। शिशु की तिरछी निगाहें और मुसकान कवि को अत्यंत प्रिय लगती हैं। मुख्य बिन्दु: शिशु सौंदर्य, वात्सल्य रस, प्रकृति से तुलना। भाषा शैली: खड़ी बोली हिंदी, सरल, सहज, बिंबात्मक, प्रगतिवादी शैली, उपमा, उत्प्रेक्षा, मानवीकरण अलंकार। क्षितिज भाग 2 (गद्य खंड) 1. स्वयं प्रकाश: नेताजी का चश्मा लेखक परिचय: स्वयं प्रकाश समकालीन कहानीकार हैं। इनका जन्म 1947 ईस्वी में इंदौर (मध्य प्रदेश) में हुआ था। इनकी कहानियों में वर्ग-शोषण के विरुद्ध चेतना और सामाजिक न्याय की वकालत मिलती है। इनकी प्रमुख रचनाएँ 'सूरज कब निकलेगा', 'आएँगे अच्छे दिन भी' आदि हैं। पाठ परिचय: यह कहानी देशभक्ति की भावना और देश के निर्माण में सभी के योगदान के महत्व को दर्शाती है। यह कहानी हमें यह संदेश देती है कि देशभक्ति केवल बड़े लोगों तक सीमित नहीं है, बल्कि एक साधारण व्यक्ति भी अपने ढंग से देश के लिए योगदान दे सकता है। कहानी का सार: हालदार साहब: एक कंपनी के अधिकारी, जो हर पंद्रहवें दिन कंपनी के काम से एक कस्बे से गुजरते थे। उन्हें नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मूर्ति पर चश्मा न होना खटकता था। कैप्टन चश्मेवाला: एक बूढ़ा, लँगड़ा, गरीब व्यक्ति जो फेरी लगाकर चश्मे बेचता था। उसे नेताजी की मूर्ति बिना चश्मे के अच्छी नहीं लगती थी, इसलिए वह अपनी दुकान से एक चश्मा मूर्ति पर लगा देता था। लोग उसे 'कैप्टन' कहते थे। पानवाला: एक मोटा, खुशमिजाज व्यक्ति जो कैप्टन का मजाक उड़ाता था। कहानी का विकास: हालदार साहब हर बार नेताजी की मूर्ति पर नया चश्मा देखते थे। उन्हें कैप्टन के इस कार्य से देशभक्ति की भावना का पता चलता है। कैप्टन की मृत्यु के बाद मूर्ति पर चश्मा न होने से हालदार साहब दुखी होते हैं। अंतिम दृश्य: एक दिन हालदार साहब देखते हैं कि मूर्ति पर सरकंडे का बना चश्मा लगा है, जिसे किसी बच्चे ने बनाया है। यह देखकर उनकी आँखें भर आती हैं। मुख्य बिन्दु: देशभक्ति की भावना, छोटे व्यक्ति का योगदान, मूर्ति का महत्व, समाज का नजरिया। संदेश: देशभक्ति का अर्थ केवल बड़े-बड़े बलिदान देना नहीं है, बल्कि देश के प्रति अपने छोटे-छोटे कर्तव्यों को निभाना भी है। कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितना भी साधारण क्यों न हो, अपने देश के लिए महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। भाषा शैली: सरल, सहज, व्यंग्यात्मक। 2. रामवृक्ष बेनीपुरी: बालगोबिन भगत लेखक परिचय: रामवृक्ष बेनीपुरी का जन्म 1899 ईस्वी में मुजफ्फरपुर (बिहार) में हुआ था। ये एक पत्रकार, संपादक और साहित्यकार थे। इन्होंने स्वाधीनता संग्राम में भी सक्रिय भूमिका निभाई। इनकी प्रमुख रचनाएँ 'गेहूँ और गुलाब', 'माटी की मूरतें' (रेखाचित्र), 'अंबपाली' (नाटक) आदि हैं। पाठ परिचय: यह एक रेखाचित्र है, जिसमें बालगोबिन भगत नामक एक गृहस्थ संत के व्यक्तित्व, उनकी जीवन शैली और उनके विचारों का सजीव चित्रण किया गया है। यह पाठ हमें यह संदेश देता है कि सच्चा संन्यास बाहरी वेशभूषा में नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धता, मानवीय मूल्यों और कर्तव्यनिष्ठा में है। रेखाचित्र का सार: बालगोबिन भगत का व्यक्तित्व: वे मझोले कद के, गोरे रंग के, साठ वर्ष से ऊपर के व्यक्ति थे। दाढ़ी-जटा तो नहीं रखते थे, किंतु उनका चेहरा सफेद बालों से जगमगाता रहता था। वे कबीर के पक्के भक्त थे। गृहस्थ जीवन: वे गृहस्थ थे, खेती-बाड़ी करते थे, पुत्र-पुत्रवधू भी थे, किंतु उनका आचरण संन्यासियों जैसा था। वे किसी से झगड़ा नहीं करते थे, न किसी की चीज छूते थे। कबीर के प्रति श्रद्धा: वे कबीर के गीतों को गाते थे, उन्हीं के आदर्शों पर चलते थे। कबीर के पदों को गाते हुए वे मस्त रहते थे। सामाजिक रूढ़ियों का खंडन: उन्होंने अपने पुत्र की मृत्यु पर शोक मनाने के बजाय उत्सव मनाया, क्योंकि उनका मानना था कि आत्मा परमात्मा से मिल गई है। उन्होंने अपनी पुत्रवधू से उसके भाई को बुलाकर उसका दूसरा विवाह करने का आदेश दिया। साधना और नियम: वे गंगा स्नान के लिए दूर तक पैदल जाते थे, हर सुबह प्रभाती गाते थे, गर्मियों में भी उनकी प्रभाती चलती रहती थी। वे अपने खेत की उपज पहले कबीरपंथी मठ में भेंट करते थे और प्रसाद के रूप में जो मिलता उसे ही ग्रहण करते थे। मृत्यु: वे अपनी दिनचर्या और नियमों का पालन करते हुए ही मृत्यु को प्राप्त हुए। मुख्य बिन्दु: गृहस्थ संत का जीवन, कबीर भक्ति, सामाजिक सुधार, कर्तव्यनिष्ठा, सादगी। संदेश: सच्चा संन्यास जीवन के कर्तव्यों से भागना नहीं, बल्कि उन्हें निष्ठापूर्वक निभाते हुए आध्यात्मिक जीवन जीना है। आडंबरहीन जीवन और मानवीय मूल्यों का पालन ही श्रेष्ठ है। भाषा शैली: सरल, सहज, चित्रात्मक, रेखाचित्र शैली। 3. यशपाल: लखनवी अंदाज़ लेखक परिचय: यशपाल प्रगतिशील विचारधारा के प्रमुख कहानीकार हैं। इनका जन्म 1903 ईस्वी में फिरोजपुर छावनी (पंजाब) में हुआ था। इनकी कहानियों में सामाजिक विसंगतियों, वर्ग-संघर्ष और पाखंड पर व्यंग्य मिलता है। इनकी प्रमुख रचनाएँ 'ज्ञानदान', 'पिंजड़े की उड़ान', 'फूलों का कुर्ता' (कहानी संग्रह), 'झूठा सच' (उपन्यास) आदि हैं। पाठ परिचय: यह एक व्यंग्यात्मक कहानी है, जो सामंती वर्ग की बनावटी जीवन शैली और पतनशील सामंती समाज पर व्यंग्य करती है। यह कहानी हमें यह भी बताती है कि बिना पात्र, घटना और विचार के भी कहानी लिखी जा सकती है, लेकिन यह एक व्यंग्य के रूप में प्रस्तुत किया गया है। कहानी का सार: लेखक की यात्रा: लेखक को एक नई कहानी के लिए विचार करने के लिए एकांत चाहिए था, इसलिए वे सेकंड क्लास के डिब्बे में यात्रा कर रहे थे। नवाब साहब: डिब्बे में पहले से ही एक नवाब बैठे थे, जो खीरे खरीदकर लाए थे और बड़े करीने से उन्हें काटकर तौलिए पर सजाए हुए थे। नवाब का दिखावा: नवाब साहब ने लेखक से खीरा खाने के लिए पूछा, लेकिन लेखक ने मना कर दिया। नवाब साहब ने खीरे को बड़े नजाकत से काटा, उस पर नमक-मिर्च लगाया, सूंघा और फिर एक-एक फाँक को खिड़की से बाहर फेंक दिया। लेखक का विश्लेषण: लेखक नवाब साहब के इस व्यवहार को देखकर आश्चर्यचकित होते हैं और सोचते हैं कि जब खीरा खाने की इच्छा थी तो फेंक क्यों दिया? उन्हें यह व्यवहार बनावटी और सामंती दिखावे से भरा लगता है। कहानी का व्यंग्य: लेखक इस घटना से यह निष्कर्ष निकालते हैं कि जब नवाब साहब बिना खाए केवल सूंघकर ही पेट भर सकते हैं, तो बिना घटना, पात्र और विचार के भी कहानी लिखी जा सकती है। यह उस सामंती वर्ग पर व्यंग्य है, जो अपनी झूठी शान और दिखावे में जीता है। मुख्य बिन्दु: दिखावा, आडंबर, सामंती मानसिकता पर व्यंग्य, बिना विचार के कहानी लिखने की बात। संदेश: दिखावटी जीवन शैली और आडंबरपूर्ण व्यवहार समाज में खोखलापन पैदा करता है। यह कहानी हमें अपनी जड़ों से जुड़े रहने और यथार्थ को स्वीकार करने की प्रेरणा देती है। भाषा शैली: सरल, सहज, व्यंग्यात्मक, चित्रात्मक। 4. मन्नू भंडारी: एक कहानी यह भी लेखिका परिचय: मन्नू भंडारी समकालीन हिंदी साहित्य की प्रमुख कथाकार हैं। इनका जन्म 1931 ईस्वी में भानपुरा (मध्य प्रदेश) में हुआ था। इनकी कहानियों और उपन्यासों में स्त्री जीवन की समस्याओं, मध्यवर्गीय समाज की विसंगतियों और बदलते सामाजिक मूल्यों का चित्रण मिलता है। इनकी प्रमुख रचनाएँ 'आपका बंटी', 'महाभोज' (उपन्यास), 'यही सच है', 'त्रिशंकु' (कहानी संग्रह) आदि हैं। पाठ परिचय: यह आत्मकथ्यात्मक शैली में लिखा गया एक संस्मरण है, जिसमें लेखिका ने अपने बचपन, अपने पिता और अध्यापिका शीला अग्रवाल के प्रभाव से अपने व्यक्तित्व के निर्माण की कहानी बताई है। यह स्त्री शिक्षा, स्वतंत्रता और सामाजिक जागरूकता के महत्व को दर्शाता है। संस्मरण का सार: बचपन और पिता का प्रभाव: लेखिका का बचपन अजमेर में बीता। उनके पिता एक रूढ़िवादी लेकिन महत्वाकांक्षी व्यक्ति थे। वे लेखिका को घर में ही शिक्षित करते थे, लेकिन साथ ही उन्हें बाहरी दुनिया से भी परिचित कराते थे। पिता के दोहरे व्यक्तित्व का लेखिका पर गहरा प्रभाव पड़ा था। शीला अग्रवाल का प्रभाव: लेखिका की हिंदी अध्यापिका शीला अग्रवाल ने उनके जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने लेखिका को साहित्य पढ़ने और सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका: 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के समय लेखिका ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। वे हड़तालों, प्रदर्शनों और भाषणों में सक्रिय रहीं। व्यक्तित्व का विकास: इन अनुभवों और प्रभावों से लेखिका का व्यक्तित्व एक स्वतंत्र, विचारशील और जागरूक स्त्री के रूप में विकसित हुआ। उन्होंने रूढ़ियों को चुनौती दी और अपनी पहचान बनाई। लेखिका बनने की प्रेरणा: उनके जीवन के अनुभव और समाज के प्रति जागरूकता ने उन्हें एक लेखिका बनने की प्रेरणा दी। मुख्य बिन्दु: व्यक्तित्व निर्माण, पिता का प्रभाव, अध्यापिका का योगदान, स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदारी, स्त्री शिक्षा और स्वतंत्रता। संदेश: स्त्री को अपनी पहचान बनाने के लिए शिक्षा, जागरूकता और संघर्ष की आवश्यकता है। परिवार और शिक्षकों का सकारात्मक प्रभाव व्यक्ति के व्यक्तित्व निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भाषा शैली: आत्मकथ्यात्मक, सरल, सहज, भावनात्मक। 5. यतीन्द्र मिश्र: नौबतखाने में इबादत लेखक परिचय: यतीन्द्र मिश्र समकालीन हिंदी साहित्य के प्रमुख लेखक हैं। इनका जन्म 1977 ईस्वी में अयोध्या (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। ये साहित्य, संगीत और कला के मर्मज्ञ हैं। इनकी प्रमुख रचनाएँ 'यदा-कदा', 'अयोध्या तथा अन्य कविताएँ' (कविता संग्रह) आदि हैं। पाठ परिचय: यह एक व्यक्ति-चित्र है, जिसमें प्रसिद्ध शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ के जीवन, कला, व्यक्तित्व और उनकी धार्मिक सहिष्णुता का मार्मिक चित्रण किया गया है। यह पाठ कला और धर्म के समन्वय, सादगी और विनम्रता के महत्व को दर्शाता है। व्यक्ति-चित्र का सार: बिस्मिल्ला खाँ का परिचय: उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ (असली नाम कमरुद्दीन) भारत रत्न से सम्मानित महान शहनाई वादक थे। उनका जन्म डुमराँव (बिहार) में हुआ था और वे काशी में पले-बढ़े। काशी से लगाव: उन्हें काशी से गहरा लगाव था। वे गंगा, बालाजी मंदिर और विश्वनाथ मंदिर को अपनी प्रेरणा का स्रोत मानते थे। शहनाई और इबादत: वे शहनाई को केवल एक वाद्य यंत्र नहीं, बल्कि ईश्वर की इबादत का माध्यम मानते थे। उनकी शहनाई से निकलने वाली धुनें धार्मिक सद्भाव का प्रतीक थीं। धार्मिक सहिष्णुता: वे एक सच्चे मुसलमान होते हुए भी हिंदू देवी-देवताओं और मंदिरों के प्रति गहरी श्रद्धा रखते थे। वे मोहर्रम में शोक मनाते थे और बालाजी मंदिर में शहनाई बजाते थे। सादगी और विनम्रता: वे अत्यंत सादगी पसंद और विनम्र व्यक्ति थे। उन्हें किसी भी प्रकार का दिखावा पसंद नहीं था। उन्हें भारत रत्न मिलने के बाद भी वे अपनी पुरानी जीवन शैली में रहे। कला के प्रति समर्पण: वे अपनी कला के प्रति पूर्णतः समर्पित थे। वे हमेशा रियाज करते रहते थे और ईश्वर से सच्चा सुर माँगते थे। मुख्य बिन्दु: बिस्मिल्ला खाँ का जीवन, शहनाई वादन, धार्मिक सहिष्णुता, काशी का महत्व, कला और इबादत। संदेश: कला किसी धर्म या जाति की मोहताज नहीं होती। सच्ची कला और सच्ची इबादत व्यक्ति को मानवीय मूल्यों से जोड़ती है और धार्मिक सद्भाव तथा सांस्कृतिक एकता का महत्व समझाती है। भाषा शैली: सरल, सहज, भावनात्मक, व्यक्ति-चित्रात्मक, उर्दू शब्दों का प्रयोग। कृतिका भाग 2 1. शिवपूजन सहाय: माता का आँचल लेखक परिचय: शिवपूजन सहाय का जन्म 1893 ईस्वी में उनवाँस (बिहार) में हुआ था। ये हिंदी साहित्य के प्रमुख गद्यकार थे। इन्होंने 'मतवाला', 'माधुरी' जैसी पत्रिकाओं का संपादन किया। इनकी प्रमुख रचनाएँ 'देहाती दुनिया' (उपन्यास), 'ग्राम सुधार' आदि हैं। पाठ परिचय: यह पाठ 'देहाती दुनिया' उपन्यास से लिया गया है। यह एक आत्मकथात्मक शैली में लिखा गया संस्मरण है, जिसमें ग्रामीण बचपन, बाल-सुलभ क्रीड़ाओं, पिता के स्नेह और माँ के आँचल की महत्ता का चित्रण है। संस्मरण का सार: भोलानाथ का बचपन: लेखक का बचपन (भोलानाथ) ग्रामीण परिवेश में बीता। वे अपने पिता से अत्यधिक जुड़े हुए थे। पिता उन्हें अपने साथ नहलाते, पूजा करवाते और अपने साथ बिठाकर खाना खिलाते थे। पिता का स्नेह: पिता उन्हें अपने कंधे पर बिठाकर गंगा किनारे ले जाते थे, जहाँ वे मछलियों को आटे की गोलियाँ खिलाते थे। वे भोलानाथ के साथ कुश्ती भी लड़ते थे और उन्हें खेल-खेल में हरा देते थे। बाल-क्रीड़ाएँ: भोलानाथ अपने हमउम्र बच्चों के साथ विभिन्न प्रकार के खेल खेलते थे, जैसे - चबूतरा बनाकर दुकानदारी करना, बारात निकालना, खेती करना आदि। ये खेल अत्यंत सरल और स्वाभाविक थे। माँ का आँचल: एक बार जब बच्चे साँप से डरकर भागते हैं, तो भोलानाथ भी डरकर सीधे अपनी माँ की गोद में छिप जाते हैं। माँ उन्हें आँचल में छुपाकर घाव पर हल्दी लगाती है। इस घटना से माँ के आँचल की सुरक्षा और ममता का महत्व उजागर होता है। मुख्य बिन्दु: ग्रामीण बचपन, पिता-पुत्र का संबंध, बाल-क्रीड़ाएँ, माँ की ममता, प्राकृतिक परिवेश। संदेश: बचपन के दिन सबसे अनमोल होते हैं। माता-पिता का स्नेह और सुरक्षा बच्चों के लिए सबसे महत्वपूर्ण होती है। माँ का आँचल बच्चे के लिए सबसे सुरक्षित स्थान होता है। भाषा शैली: आंचलिक शब्दों का प्रयोग, सरल, सहज, चित्रात्मक, भावनात्मक। 2. मधु कांकरिया: साना-साना हाथ जोड़ि लेखिका परिचय: मधु कांकरिया समकालीन हिंदी साहित्य की प्रमुख लेखिका हैं। इनका जन्म 1957 ईस्वी में कोलकाता में हुआ था। इनकी रचनाओं में स्त्री विमर्श, महानगरीय जीवन की जटिलताएँ और सामाजिक सरोकार मिलते हैं। इनकी प्रमुख रचनाएँ 'खुले गगन के लाल सितारे', 'सलाम आख़िरी' (कहानी संग्रह) आदि हैं। पाठ परिचय: यह एक यात्रा-वृत्तांत है, जिसमें लेखिका ने सिक्किम की राजधानी गंगटोक और उसके आसपास के हिमालयी क्षेत्रों की यात्रा का वर्णन किया है। यह पाठ प्रकृति के अद्भुत सौंदर्य, पहाड़ी लोगों के जीवन संघर्ष और लेखिका की संवेदनशीलता को दर्शाता है। यात्रा-वृत्तांत का सार: गंगटोक की यात्रा: लेखिका गंगटोक की यात्रा पर निकलती हैं। रात में गंगटोक का सौंदर्य उन्हें सम्मोहित कर लेता है। वे वहाँ के लोगों की प्रार्थना 'साना-साना हाथ जोड़ि' (छोटे-छोटे हाथ जोड़कर) से प्रभावित होती हैं। हिमालय का सौंदर्य: लेखिका हिमालय के अद्भुत सौंदर्य से अभिभूत होती हैं। वे वहाँ के झरने, तीस्ता नदी, बर्फ से ढकी चोटियाँ और रंग-बिरंगे फूलों को देखकर मंत्रमुग्ध हो जाती हैं। पहाड़ी लोगों का जीवन: लेखिका पहाड़ी लोगों के कठिन जीवन संघर्ष को देखती हैं। वे देखती हैं कि स्त्रियाँ और बच्चे भी पहाड़ों पर सड़कें बनाने, पत्थरों को तोड़ने और सामान ढोने का काम करते हैं। उन्हें यह सब देखकर दुख होता है। प्रकृति संरक्षण: लेखिका प्रकृति संरक्षण के प्रति भी चिंतित होती हैं। वे प्रदूषण और पर्यटन के कारण प्रकृति को होने वाले नुकसान पर विचार करती हैं। आध्यात्मिक अनुभव: हिमालय की शांत और भव्य प्रकृति में लेखिका को एक आध्यात्मिक अनुभव होता है, जो उन्हें जीवन के गहरे अर्थों से परिचित कराता है। मुख्य बिन्दु: प्रकृति सौंदर्य, पहाड़ी जीवन, संघर्ष, पर्यटन, पर्यावरण संरक्षण, आध्यात्मिक अनुभव। संदेश: प्रकृति का सम्मान करना और उसका संरक्षण करना हमारा कर्तव्य है। हमें पहाड़ी लोगों के जीवन संघर्ष को समझना चाहिए और उनके प्रति संवेदनशील होना चाहिए। भाषा शैली: सरल, सहज, चित्रात्मक, भावनात्मक, यात्रा-वृत्तांत शैली। 3. भदंत आनंद कौसल्यायन: संस्कृति लेखक परिचय: भदंत आनंद कौसल्यायन बौद्ध धर्म के भिक्षु और विद्वान थे। इनका जन्म 1905 ईस्वी में अंबाला (पंजाब) में हुआ था। इन्होंने बौद्ध धर्म और दर्शन पर अनेक ग्रंथ लिखे। इनकी प्रमुख रचनाएँ 'भिक्षु के पत्र', 'जो भूल न सका' आदि हैं। पाठ परिचय: यह एक विचारात्मक निबंध है, जिसमें लेखक ने 'संस्कृति' और 'सभ्यता' के अंतर को स्पष्ट करते हुए संस्कृति के मूल स्वरूप को समझाने का प्रयास किया है। यह पाठ हमें यह सिखाता है कि मानव कल्याण की भावना ही सच्ची संस्कृति का मूल आधार है। निबंध का सार: सभ्यता और संस्कृति: लेखक सभ्यता को संस्कृति का परिणाम मानते हैं। सभ्यता वह है जो हमें दिखाई देती है (जैसे घर, कपड़े, यातायात के साधन), जबकि संस्कृति वह मूल प्रेरणा है जो सभ्यता को जन्म देती है। संस्कृति की परिभाषा: लेखक कहते हैं कि संस्कृति वह विशिष्ट गुण है जो मानव को पशुता से ऊपर उठाता है और उसे नया आविष्कार करने, नई खोज करने की प्रेरणा देता है। उदाहरण: आग का आविष्कार: जब मानव ने पहली बार आग का आविष्कार किया तो यह उसकी संस्कृति थी। आग का उपयोग (सभ्यता) बाद में आया। सुई-धागे का आविष्कार: जब मानव ने ठंड से बचने के लिए कपड़े सिलने की सोची और सुई-धागे का आविष्कार किया, तो यह उसकी संस्कृति थी। न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण: न्यूटन ने सेब को गिरते देखा और गुरुत्वाकर्षण के नियम की खोज की। यह उसकी जिज्ञासा और बौद्धिक संस्कृति थी। संस्कृति का मूल: लेखक जोर देते हैं कि मानव कल्याण की भावना ही संस्कृति का मूल है। जो आविष्कार या खोज मानव का अहित करती है, वह संस्कृति नहीं हो सकती। सांस्कृतिक विरासत: संस्कृति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित होती है और मानव समाज को आगे बढ़ाती है। मुख्य बिन्दु: सभ्यता और संस्कृति में अंतर, आविष्कार की प्रेरणा, मानव कल्याण का महत्व, बौद्धिक जिज्ञासा। संदेश: मानव कल्याण ही संस्कृति का आधार है। हमें अपनी सांस्कृतिक विरासत को समझना और उसका संरक्षण करना चाहिए। भाषा शैली: सरल, सहज, तार्किक, विचारात्मक। व्याकरण 1. रचना के आधार पर वाक्य भेद परिभाषा: वाक्यों की रचना को देखकर उनके प्रकार बताना। भेद: सरल वाक्य: परिभाषा: जिस वाक्य में एक उद्देश्य (कर्ता) और एक विधेय (क्रिया) होता है, उसे सरल वाक्य कहते हैं। इसमें एक ही मुख्य क्रिया होती है। उदाहरण: राम पुस्तक पढ़ता है। (राम-उद्देश्य, पुस्तक पढ़ता है-विधेय) बच्चे मैदान में खेल रहे हैं। सूर्य उदय होते ही अँधेरा दूर हो गया। संयुक्त वाक्य: परिभाषा: जिस वाक्य में दो या दो से अधिक स्वतंत्र उपवाक्य (जो अपने आप में पूर्ण अर्थ देते हैं) किसी समुच्चयबोधक अव्यय (जैसे - और, तथा, या, अथवा, किंतु, परंतु, लेकिन, इसलिए, अतः, एवं आदि) से जुड़े होते हैं, उसे संयुक्त वाक्य कहते हैं। उदाहरण: वह आया और चला गया। राम पढ़ता है किंतु श्याम खेलता है। मैं बीमार था इसलिए स्कूल नहीं जा सका। मिश्र वाक्य: परिभाषा: जिस वाक्य में एक प्रधान उपवाक्य (मुख्य उपवाक्य) और एक या एक से अधिक आश्रित उपवाक्य (जो प्रधान उपवाक्य पर निर्भर होते हैं) होते हैं, उसे मिश्र वाक्य कहते हैं। आश्रित उपवाक्य प्रायः 'जो', 'जिसे', 'जब', 'तब', 'जहाँ', 'वहाँ', 'यदि', 'तो', 'क्योंकि', 'की' आदि योजक शब्दों से जुड़े होते हैं। उदाहरण: जो लड़का पढ़ रहा है, वह मेरा भाई है। (वह मेरा भाई है - प्रधान उपवाक्य, जो लड़का पढ़ रहा है - आश्रित उपवाक्य) जब वर्षा हुई, तब मोर नाचने लगे। वह घर गया क्योंकि उसे बुखार था। परिवर्तन: सरल को संयुक्त में, संयुक्त को मिश्र में आदि। 2. वाच्य परिभाषा: क्रिया के जिस रूप से यह ज्ञात हो कि वाक्य में क्रिया द्वारा कही गई बात का मुख्य विषय कर्ता है, कर्म है या भाव है, उसे वाच्य कहते हैं। भेद: कर्तृवाच्य (Active Voice): परिभाषा: जिस वाक्य में क्रिया का मुख्य संबंध कर्ता से होता है, अर्थात क्रिया के लिंग, वचन और पुरुष कर्ता के अनुसार होते हैं। पहचान: कर्ता प्रधान होता है। क्रिया अकर्मक या सकर्मक हो सकती है। उदाहरण: राम पुस्तक पढ़ता है। (पढ़ता है - कर्ता 'राम' के अनुसार पुल्लिंग, एकवचन) लड़की गाना गाती है। (गाती है - कर्ता 'लड़की' के अनुसार स्त्रीलिंग, एकवचन) कर्मवाच्य (Passive Voice): परिभाषा: जिस वाक्य में क्रिया का मुख्य संबंध कर्म से होता है, अर्थात क्रिया के लिंग, वचन और पुरुष कर्म के अनुसार होते हैं। कर्ता के बाद 'से' या 'के द्वारा' लगता है। पहचान: कर्म प्रधान होता है। क्रिया हमेशा सकर्मक होती है। कर्ता अनुपस्थित भी हो सकता है। उदाहरण: राम के द्वारा पुस्तक पढ़ी जाती है। (पढ़ी जाती है - कर्म 'पुस्तक' के अनुसार स्त्रीलिंग, एकवचन) मेरे द्वारा पत्र लिखा गया। पतंग उड़ाई जा रही है। (कर्ता अनुपस्थित) भाववाच्य (Impersonal Voice): परिभाषा: जिस वाक्य में क्रिया का मुख्य संबंध न तो कर्ता से होता है और न ही कर्म से, बल्कि भाव (क्रिया के अर्थ) की प्रधानता होती है। क्रिया सदैव अकर्मक, पुल्लिंग, एकवचन और अन्य पुरुष में होती है। कर्ता के बाद 'से' लगता है। पहचान: भाव प्रधान होता है। क्रिया हमेशा अकर्मक होती है। प्रायः असमर्थता या विवशता व्यक्त करने के लिए प्रयुक्त होता है। उदाहरण: मुझसे चला नहीं जाता। (चला जाता है - भाव प्रधान, अकर्मक, पुल्लिंग, एकवचन) बच्चों से हँसा जाता है। अब बैठा जाए। वाच्य परिवर्तन: कर्तृवाच्य से कर्मवाच्य/भाववाच्य में और इसके विपरीत। 3. पद परिचय परिभाषा: वाक्य में प्रयुक्त प्रत्येक सार्थक शब्द 'पद' कहलाता है। इन पदों का व्याकरणिक परिचय देना 'पद परिचय' कहलाता है। इसमें पद के भेद, उपभेद, लिंग, वचन, कारक और अन्य पदों से उसका संबंध बताया जाता है। पद परिचय के बिन्दु: संज्ञा: भेद (व्यक्तिवाचक, जातिवाचक, भाववाचक) लिंग (पुल्लिंग, स्त्रीलिंग) वचन (एकवचन, बहुवचन) कारक (कर्ता, कर्म, करण, संप्रदान, अपादान, संबंध, अधिकरण, संबोधन) क्रिया से संबंध (कर्ता है, कर्म है, करण है आदि) उदाहरण: 'राम' ने 'रावण' को मारा। राम: व्यक्तिवाचक संज्ञा, पुल्लिंग, एकवचन, कर्ता कारक, 'मारा' क्रिया का कर्ता। रावण: व्यक्तिवाचक संज्ञा, पुल्लिंग, एकवचन, कर्म कारक, 'मारा' क्रिया का कर्म। सर्वनाम: भेद (पुरुषवाचक, निजवाचक, निश्चयवाचक, अनिश्चयवाचक, प्रश्नवाचक, संबंधवाचक) लिंग (पुल्लिंग, स्त्रीलिंग) वचन (एकवचन, बहुवचन) कारक क्रिया से संबंध उदाहरण: वह पढ़ता है। वह: पुरुषवाचक सर्वनाम (अन्य पुरुष), पुल्लिंग, एकवचन, कर्ता कारक, 'पढ़ता है' क्रिया का कर्ता। विशेषण: भेद (गुणवाचक, संख्यावाचक, परिमाणवाचक, सार्वनामिक/संकेतवाचक) अवस्था (मूलावस्था, उत्तरावस्था, उत्तमावस्था) लिंग, वचन (विशेष्य के अनुसार) विशेष्य (जिसकी विशेषता बताई जा रही है) उदाहरण: मोहन अच्छा लड़का है। अच्छा: गुणवाचक विशेषण, मूलावस्था, पुल्लिंग, एकवचन, 'लड़का' विशेष्य का विशेषण। क्रिया: भेद (सकर्मक, अकर्मक) लिंग, वचन, पुरुष (कर्ता या कर्म के अनुसार) धातु (मूल रूप) काल (वर्तमान, भूत, भविष्य) वाच्य (कर्तृवाच्य, कर्मवाच्य, भाववाच्य) उदाहरण: बच्चे गेंद खेल रहे हैं । खेल रहे हैं: सकर्मक क्रिया, 'खेलना' धातु, पुल्लिंग, बहुवचन, वर्तमान काल, कर्तृवाच्य। अव्यय (अविकारी शब्द): क्रियाविशेषण: क्रिया की विशेषता बताता है। भेद (कालवाचक, स्थानवाचक, रीतिवाचक, परिमाणवाचक)। उदाहरण: वह धीरे-धीरे चलता है। (धीरे-धीरे: रीतिवाचक क्रियाविशेषण, 'चलता है' क्रिया की विशेषता) संबंधबोधक: संज्ञा या सर्वनाम का संबंध वाक्य के अन्य शब्दों से जोड़ता है। के ऊपर, के नीचे, के पास आदि। उदाहरण: घर के पास मंदिर है। (के पास: संबंधबोधक अव्यय, 'घर' का संबंध 'मंदिर' से) समुच्चयबोधक: दो शब्दों, वाक्यांशों या वाक्यों को जोड़ता है। और, एवं, तथा, या, परंतु, लेकिन, क्योंकि आदि। उदाहरण: राम और श्याम पढ़ रहे हैं। (और: समुच्चयबोधक अव्यय, 'राम' और 'श्याम' को जोड़ रहा है) विस्मयादिबोधक: हर्ष, शोक, घृणा, आश्चर्य आदि भावों को व्यक्त करता है। अरे!, वाह!, हाय!, छि:! आदि। उदाहरण: वाह! कितना सुंदर दृश्य है। (वाह!: विस्मयादिबोधक अव्यय, हर्ष सूचक) 4. अलंकार परिभाषा: काव्य की शोभा बढ़ाने वाले तत्व अलंकार कहलाते हैं। भेद: शब्दालंकार: शब्द के कारण चमत्कार। अनुप्रास अलंकार: जहाँ एक ही वर्ण की आवृत्ति बार-बार हो। उदाहरण: 'तरनि तनुजा तट तमाल तरुवर बहु छाए।' (त वर्ण की आवृत्ति) यमक अलंकार: जहाँ एक ही शब्द दो या दो से अधिक बार आए और हर बार उसका अर्थ भिन्न हो। उदाहरण: 'कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय। या खाए बौराए जग, वा पाए बौराए।' (एक कनक-सोना, दूसरा कनक-धतूरा) श्लेष अलंकार: जहाँ एक ही शब्द के अनेक अर्थ हों, और प्रसंगवश अलग-अलग अर्थ निकलें। उदाहरण: 'रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून। पानी गए न ऊबरे, मोती मानुष चून।' (पानी-चमक, इज्जत, जल) अर्थालंकार: अर्थ के कारण चमत्कार। उपमा अलंकार: जहाँ दो भिन्न वस्तुओं में उनके गुण, धर्म या क्रिया के आधार पर समानता बताई जाए। (सा, सी, से, सरिस, समान, इव जैसे वाचक शब्द) उदाहरण: 'पीपर पात सरिस मन डोला.' (मन पीपल के पत्ते के समान डोल गया) रूपक अलंकार: जहाँ उपमेय (जिसकी तुलना की जाए) पर उपमान (जिससे तुलना की जाए) का अभेद आरोप हो, अर्थात दोनों को एक ही मान लिया जाए। (वाचक शब्द नहीं होते) उदाहरण: 'चरण कमल बंदौ हरि राई.' (चरणों को कमल ही मान लिया गया है) उत्प्रेक्षा अलंकार: जहाँ उपमेय में उपमान की संभावना या कल्पना की जाए। (मनु, मानो, जनु, जानो, मनहु, जनहु जैसे वाचक शब्द) उदाहरण: 'सोहत ओढ़े पीत पट, स्याम सलोने गात। मनहु नीलमनि सैल पर, आतप परयौ प्रभात।' (श्याम के शरीर में नीलमणि पर्वत की संभावना) अतिशयोक्ति अलंकार: जहाँ किसी बात को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर कहा जाए। उदाहरण: 'हनुमान की पूँछ में लग न पाई आग, लंका सिगरी जल गई, गए निशाचर भाग।' (आग लगने से पहले ही लंका का जलना) मानवीकरण अलंकार: जहाँ जड़ पदार्थों या प्रकृति के अंगों पर मानवीय चेष्टाओं का आरोप किया जाए। उदाहरण: 'मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के।' (बादलों का मनुष्य की तरह सज-धज कर आना) लेखन 1. विज्ञापन लेखन परिभाषा: किसी उत्पाद, सेवा, विचार या व्यक्ति का प्रचार-प्रसार करने वाला लिखित या दृश्य माध्यम। उद्देश्य: लोगों को आकर्षित करना, सूचित करना और खरीदने या अपनाने के लिए प्रेरित करना। मुख्य बिन्दु/विशेषताएँ: शीर्षक: आकर्षक, संक्षिप्त और ध्यान खींचने वाला। (उदा: 'खुशखबरी!', 'महा-बचत!') उत्पाद/सेवा का नाम: स्पष्ट और बड़े अक्षरों में। विशेषताएँ: उत्पाद/सेवा के लाभों और गुणों का संक्षिप्त लेकिन प्रभावशाली वर्णन। (उदा: 'टिकाऊ', 'स्वाद में बेजोड़', '50% की छूट') चित्र/ग्राफिक्स: यदि संभव हो तो आकर्षक चित्र या प्रतीक का प्रयोग करें। छूट/प्रस्ताव: यदि कोई विशेष छूट या ऑफर हो तो उसे स्पष्ट रूप से लिखें। (उदा: 'पहले 100 ग्राहकों के लिए विशेष छूट') प्रेरक वाक्य: ग्राहकों को तुरंत कार्रवाई करने के लिए प्रेरित करें। (उदा: 'आज ही खरीदें!', 'सीमित समय के लिए!') संपर्क विवरण: पता, फोन नंबर, ईमेल, वेबसाइट आदि। स्थान/समय: यदि कोई विशेष स्थान या तिथि हो। भाषा: सरल, संक्षिप्त, प्रभावशाली, प्रेरक और रचनात्मक। सीमा: आमतौर पर 25-50 शब्दों में। एक बॉक्स के अंदर लिखें। 2. संदेश लेखन परिभाषा: किसी व्यक्ति या समूह को लिखित रूप में दी गई संक्षिप्त सूचना या जानकारी। उद्देश्य: महत्वपूर्ण जानकारी को संक्षेप में और स्पष्ट रूप से संप्रेषित करना। मुख्य बिन्दु/विशेषताएँ: शीर्षक: 'संदेश' बीच में लिखें। दिनांक: बाईं ओर लिखें। (उदा: 15 अप्रैल 2024) समय: बाईं ओर लिखें। (उदा: सुबह 10:00 बजे) संबोधन: जिसे संदेश भेजा जा रहा है। (उदा: प्रिय मित्र, आदरणीय पिताजी, माँ) मुख्य भाग: संदेश का मूल विषय। यह संक्षिप्त, स्पष्ट और उद्देश्यपूर्ण होना चाहिए। अनावश्यक विवरणों से बचें। (30-40 शब्दों में) प्रेषक का नाम: संदेश भेजने वाले का नाम। भाषा: सरल, सहज, स्पष्ट और विषय के अनुसार औपचारिक या अनौपचारिक। सीमा: 30-40 शब्दों में। एक बॉक्स के अंदर लिखें। 3. पत्राचार परिभाषा: लिखित रूप में विचारों, सूचनाओं या भावनाओं का आदान-प्रदान। भेद: औपचारिक पत्र (Formal Letter): उद्देश्य: प्रधानाचार्य, संपादक, सरकारी अधिकारी, व्यापारी आदि को लिखे जाते हैं। इनका उद्देश्य किसी समस्या की शिकायत करना, जानकारी देना, आवेदन करना आदि होता है। प्रारूप: प्रेषक का पता: पत्र भेजने वाले का पता। दिनांक: जिस दिन पत्र लिखा गया है। प्राप्तकर्ता का पद और पता: जिसे पत्र भेजा जा रहा है। (सेवा में, प्रधानाचार्य/संपादक/अधिकारी, विद्यालय/कार्यालय का नाम, शहर) विषय: पत्र का संक्षिप्त और स्पष्ट उद्देश्य। (उदा: 'शुल्क माफी हेतु', 'सफाई व्यवस्था हेतु') महोदय/महोदया: संबोधन। मुख्य भाग: पत्र का विस्तृत विवरण (3 अनुच्छेदों में)। पहला अनुच्छेद: समस्या का परिचय। दूसरा अनुच्छेद: समस्या का विस्तार और कारण। तीसरा अनुच्छेद: समाधान का अनुरोध या अपेक्षा। धन्यवाद: पत्र के अंत में। समापन: भवदीय/भवदीया (यदि अज्ञात को), प्रार्थी/प्रार्थिनी (यदि आवेदन)। नाम और हस्ताक्षर: पत्र भेजने वाले का नाम और हस्ताक्षर। भाषा: औपचारिक, विनम्र, स्पष्ट और सटीक। अनौपचारिक पत्र (Informal Letter): उद्देश्य: मित्रों, संबंधियों, परिवार के सदस्यों आदि को लिखे जाते हैं। इनमें व्यक्तिगत बातें, शुभकामनाएँ, निमंत्रण आदि होते हैं। प्रारूप: प्रेषक का पता: पत्र भेजने वाले का पता। दिनांक: जिस दिन पत्र लिखा गया है। संबोधन: जिसे पत्र भेजा जा रहा है। (उदा: प्रिय मित्र, पूज्य पिताजी, प्यारी बहन) अभिवादन: संबंधानुसार। (उदा: नमस्ते, सादर प्रणाम, सस्नेह) मुख्य भाग: पत्र का विस्तृत विवरण। इसमें कुशलक्षेम पूछना, खबर देना, भावनाएँ व्यक्त करना आदि होता है। (2-3 अनुच्छेदों में) समापन: संबंधानुसार। (उदा: तुम्हारा मित्र, आपका पुत्र, तुम्हारी बहन) नाम: पत्र भेजने वाले का नाम। भाषा: अनौपचारिक, आत्मीयतापूर्ण, सरल और सहज। 4. अनुच्छेद लेखन परिभाषा: किसी एक विषय पर एक ही अनुच्छेद में अपने विचारों को संक्षिप्त और सुसंगठित रूप से व्यक्त करना। मुख्य बिन्दु/विशेषताएँ: एक विषय: पूरे अनुच्छेद में एक ही मुख्य विचार या विषय पर केंद्रित रहें। संक्षिप्तता: अनावश्यक विस्तार से बचें। (80-100 शब्दों में) सुसंगठित: विचारों में तारतम्यता और क्रमबद्धता होनी चाहिए। प्रस्तावना: विषय का संक्षिप्त परिचय। विषय-विस्तार: मुख्य विचार को उदाहरणों, तर्कों या तथ्यों के साथ स्पष्ट करें। उपसंहार: निष्कर्ष या सार। भाषा: सरल, स्पष्ट, प्रभावशाली और व्याकरणिक रूप से शुद्ध। 5. निबंध लेखन परिभाषा: किसी एक विषय पर अपने विचारों, भावनाओं और तर्कों को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करना। अनुच्छेद लेखन से अधिक विस्तृत। मुख्य बिन्दु/विशेषताएँ: प्रस्तावना (भूमिका): विषय का परिचय, उसकी महत्ता या पृष्ठभूमि। आकर्षक और संक्षिप्त। विषय-विस्तार (मुख्य भाग): यह निबंध का सबसे महत्वपूर्ण भाग होता है। इसमें विषय के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की जाती है। इसे 2-4 अनुच्छेदों में विभाजित किया जा सकता है। पहला अनुच्छेद: विषय का अर्थ, परिभाषा या इतिहास। दूसरा अनुच्छेद: विषय के लाभ/गुण या कारण। तीसरा अनुच्छेद: विषय की हानियाँ/दोष या परिणाम। चौथा अनुच्छेद: वर्तमान स्थिति, समस्याएँ और समाधान। उपसंहार (निष्कर्ष): निबंध का सार, लेखक का अंतिम विचार, सुझाव या भविष्य की आशा। भाषा: स्पष्ट, प्रवाहमयी, विचारों में तारतम्यता, व्याकरणिक शुद्धता, मुहावरों और लोकोक्तियों का प्रयोग। सीमा: 150-200 शब्दों में।