1. व्यष्टि अर्थशास्त्र का परिचय व्यष्टि अर्थशास्त्र: व्यक्तिगत आर्थिक इकाइयों (उपभोक्ता, फर्म) के व्यवहार का अध्ययन। समष्टि अर्थशास्त्र: समग्र अर्थव्यवस्था (राष्ट्रीय आय, मुद्रास्फीति) के व्यवहार का अध्ययन। केंद्रीय समस्याएं: क्या उत्पादन करें? कैसे उत्पादन करें? किसके लिए उत्पादन करें? उत्पादन संभावना वक्र (PPC): दो वस्तुओं के उन सभी संभावित संयोजनों को दर्शाता है जिनका उत्पादन दिए गए संसाधनों और तकनीक के साथ किया जा सकता है। अवसर लागत: किसी वस्तु के उत्पादन की एक अतिरिक्त इकाई प्राप्त करने के लिए त्यागी गई दूसरी वस्तु की मात्रा। 2. उपभोक्ता व्यवहार का सिद्धांत 2.1. उपयोगिता विश्लेषण उपयोगिता: किसी वस्तु या सेवा में मानवीय आवश्यकता को संतुष्ट करने की शक्ति। कुल उपयोगिता (TU): किसी वस्तु की सभी इकाइयों के उपभोग से प्राप्त कुल संतुष्टि। सीमांत उपयोगिता (MU): किसी वस्तु की एक अतिरिक्त इकाई के उपभोग से कुल उपयोगिता में होने वाला परिवर्तन। घटती सीमांत उपयोगिता का नियम: जैसे-जैसे किसी वस्तु का अधिक उपभोग किया जाता है, उसकी सीमांत उपयोगिता घटती जाती है। उपभोक्ता संतुलन (एक वस्तु): $MU_x / P_x = MU_M$ (जहाँ $MU_M$ रुपये की सीमांत उपयोगिता है)। उपभोक्ता संतुलन (दो वस्तुएं): $MU_x / P_x = MU_y / P_y = MU_M$ 2.2. उदासीनता वक्र विश्लेषण उदासीनता वक्र (IC): दो वस्तुओं के उन सभी संयोजनों को दर्शाता है जो उपभोक्ता को समान संतुष्टि प्रदान करते हैं। उदासीनता वक्र की विशेषताएं: मूल बिंदु की ओर उन्नतोदर। नीचे की ओर ढलान वाला। एक-दूसरे को नहीं काटते। ऊंचा IC उच्च संतुष्टि दर्शाता है। सीमांत प्रतिस्थापन दर (MRS): एक वस्तु की वह मात्रा जिसे उपभोक्ता दूसरी वस्तु की एक अतिरिक्त इकाई प्राप्त करने के लिए छोड़ने को तैयार होता है। $MRS_{xy} = -\Delta Y / \Delta X$ बजट रेखा: दो वस्तुओं के उन सभी संयोजनों को दर्शाता है जिन्हें उपभोक्ता अपनी दी गई आय और वस्तुओं की कीमतों पर खरीद सकता है। $P_x \cdot X + P_y \cdot Y = M$ उपभोक्ता संतुलन: जब बजट रेखा उदासीनता वक्र को स्पर्श करती है, तो $MRS_{xy} = P_x / P_y$ 3. मांग का सिद्धांत मांग: किसी निश्चित कीमत पर उपभोक्ता द्वारा किसी वस्तु की खरीदी जाने वाली मात्रा। मांग का नियम: अन्य बातें समान रहने पर, कीमत बढ़ने पर मांग घटती है और कीमत घटने पर मांग बढ़ती है। मांग वक्र: कीमत और मांगी गई मात्रा के बीच विपरीत संबंध को दर्शाता है (नीचे की ओर ढलान वाला)। मांग को प्रभावित करने वाले कारक: वस्तु की कीमत संबंधित वस्तुओं की कीमत (स्थानापन्न, पूरक) उपभोक्ता की आय उपभोक्ता की रुचि और प्राथमिकताएं भविष्य की कीमतों की अपेक्षाएं मांग में परिवर्तन: मांग वक्र पर संचलन (विस्तार/संकुचन): कीमत में परिवर्तन के कारण। मांग वक्र में शिफ्ट (वृद्धि/कमी): कीमत के अलावा अन्य कारकों में परिवर्तन के कारण। 4. मांग की लोच मांग की कीमत लोच ($E_d$): कीमत में प्रतिशत परिवर्तन के कारण मांगी गई मात्रा में प्रतिशत परिवर्तन का माप। $$E_d = \frac{\% \text{मांगी गई मात्रा में परिवर्तन}}{\% \text{कीमत में परिवर्तन}} = \frac{\Delta Q / Q}{\Delta P / P}$$ लोच की श्रेणियां: पूर्णतया लोचदार ($E_d = \infty$): कीमत में थोड़ा सा परिवर्तन मांग को अनंत कर देता है। अधिक लोचदार ($E_d > 1$): कीमत में परिवर्तन से अधिक मांग में परिवर्तन। एक समान लोचदार ($E_d = 1$): कीमत में परिवर्तन के बराबर मांग में परिवर्तन। कम लोचदार ($E_d कीमत में परिवर्तन से कम मांग में परिवर्तन। पूर्णतया बेलोचदार ($E_d = 0$): कीमत में परिवर्तन का मांग पर कोई प्रभाव नहीं। मांग की आय लोच: आय में प्रतिशत परिवर्तन के कारण मांगी गई मात्रा में प्रतिशत परिवर्तन। मांग की आड़ी लोच: संबंधित वस्तु की कीमत में प्रतिशत परिवर्तन के कारण मांगी गई मात्रा में प्रतिशत परिवर्तन। 5. उत्पादन फलन और प्रतिफल उत्पादन फलन: आगतों और निर्गत के बीच तकनीकी संबंध। $Q = f(L, K)$ अल्पकालीन उत्पादन फलन (परिवर्तनशील अनुपातों का नियम): एक आगत परिवर्तनशील और अन्य स्थिर। कुल उत्पाद (TP): सभी इकाइयों द्वारा उत्पादित कुल निर्गत। औसत उत्पाद (AP): प्रति इकाई परिवर्तनशील आगत का उत्पाद। $AP = TP / L$ सीमांत उत्पाद (MP): परिवर्तनशील आगत की एक अतिरिक्त इकाई से TP में परिवर्तन। $MP = \Delta TP / \Delta L$ परिवर्तनशील अनुपातों के नियम की अवस्थाएं: बढ़ते प्रतिफल घटते प्रतिफल ऋणात्मक प्रतिफल दीर्घकालीन उत्पादन फलन (पैमाने के प्रतिफल): सभी आगत परिवर्तनशील। बढ़ते पैमाने के प्रतिफल: आगतों में अनुपातिक वृद्धि से निर्गत में अधिक अनुपातिक वृद्धि। स्थिर पैमाने के प्रतिफल: आगतों में अनुपातिक वृद्धि से निर्गत में समान अनुपातिक वृद्धि। घटते पैमाने के प्रतिफल: आगतों में अनुपातिक वृद्धि से निर्गत में कम अनुपातिक वृद्धि। 6. लागत की अवधारणा कुल स्थिर लागत (TFC): उत्पादन की मात्रा के साथ अपरिवर्तित रहने वाली लागत। कुल परिवर्तनशील लागत (TVC): उत्पादन की मात्रा के साथ परिवर्तित होने वाली लागत। कुल लागत (TC): $TC = TFC + TVC$ औसत स्थिर लागत (AFC): $AFC = TFC / Q$ (घटती जाती है) औसत परिवर्तनशील लागत (AVC): $AVC = TVC / Q$ (U-आकार की) औसत लागत (AC): $AC = TC / Q = AFC + AVC$ (U-आकार की) सीमांत लागत (MC): उत्पादन की एक अतिरिक्त इकाई से TC में परिवर्तन। $MC = \Delta TC / \Delta Q$ (U-आकार की, AC और AVC को उनके न्यूनतम बिंदु पर काटती है) 7. आगम की अवधारणा कुल आगम (TR): बेची गई कुल मात्रा से प्राप्त कुल राशि। $TR = P \times Q$ औसत आगम (AR): प्रति इकाई बेची गई वस्तु से प्राप्त आगम। $AR = TR / Q = P$ सीमांत आगम (MR): बेची गई एक अतिरिक्त इकाई से TR में परिवर्तन। $MR = \Delta TR / \Delta Q$ MR और AR के बीच संबंध: जब AR घटता है, $MR जब AR स्थिर होता है, $MR = AR$ जब AR बढ़ता है, $MR > AR$ 8. पूर्ति का सिद्धांत पूर्ति: किसी निश्चित कीमत पर विक्रेता द्वारा बेची जाने वाली वस्तु की मात्रा। पूर्ति का नियम: अन्य बातें समान रहने पर, कीमत बढ़ने पर पूर्ति बढ़ती है और कीमत घटने पर पूर्ति घटती है। पूर्ति वक्र: कीमत और पूर्ति की गई मात्रा के बीच सीधा संबंध दर्शाता है (ऊपर की ओर ढलान वाला)। पूर्ति को प्रभावित करने वाले कारक: वस्तु की कीमत उत्पादन के कारकों की कीमत तकनीकी स्तर फर्मों की संख्या सरकारी नीतियां (कर, सब्सिडी) पूर्ति में परिवर्तन: पूर्ति वक्र पर संचलन (विस्तार/संकुचन): कीमत में परिवर्तन के कारण। पूर्ति वक्र में शिफ्ट (वृद्धि/कमी): कीमत के अलावा अन्य कारकों में परिवर्तन के कारण। पूर्ति की कीमत लोच ($E_s$): कीमत में प्रतिशत परिवर्तन के कारण पूर्ति की गई मात्रा में प्रतिशत परिवर्तन का माप। $$E_s = \frac{\% \text{पूर्ति की गई मात्रा में परिवर्तन}}{\% \text{कीमत में परिवर्तन}}$$ 9. बाजार के रूप 9.1. पूर्ण प्रतियोगिता बड़ी संख्या में क्रेता और विक्रेता। समरूप उत्पाद। फर्मों के प्रवेश और निकास की स्वतंत्रता। बाजार कीमत का पूर्ण ज्ञान। फर्म कीमत स्वीकारक होती है ($P = AR = MR$)। संतुलन: $MC = MR$ और MC वक्र MR वक्र को नीचे से काटे। 9.2. एकाधिकार एक अकेला विक्रेता। कोई निकट स्थानापन्न नहीं। प्रवेश पर बाधाएं। फर्म कीमत निर्माता होती है ($P > MR$)। संतुलन: $MC = MR$ 9.3. एकाधिकार प्रतियोगिता बड़ी संख्या में क्रेता और विक्रेता। विभेदित उत्पाद। फर्मों के प्रवेश और निकास की स्वतंत्रता। फर्म के पास कुछ हद तक कीमत नियंत्रण होता है। संतुलन: $MC = MR$ 9.4. अल्पाधिकार कुछ बड़े विक्रेता। उत्पाद समरूप या विभेदित हो सकते हैं। प्रवेश पर बाधाएं। फर्मों के बीच अन्योन्याश्रयता। 10. राष्ट्रीय आय और संबंधित समुच्चय सकल घरेलू उत्पाद (GDP): एक लेखा वर्ष में एक देश की घरेलू सीमा के भीतर उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का मौद्रिक मूल्य। सकल राष्ट्रीय उत्पाद (GNP): $GNP = GDP + विदेशों से शुद्ध कारक आय$ शुद्ध घरेलू उत्पाद (NDP): $NDP = GDP - मूल्यह्रास$ शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद (NNP): $NNP = GNP - मूल्यह्रास$ बाजार कीमत पर NNP (राष्ट्रीय आय): $NNP_{MP}$ कारक लागत पर NNP (राष्ट्रीय आय): $NNP_{FC} = NNP_{MP} - शुद्ध अप्रत्यक्ष कर$ (शुद्ध अप्रत्यक्ष कर = अप्रत्यक्ष कर - सब्सिडी) व्यक्तिगत आय: $PI = NI - अविभाजित लाभ - निगम कर - शुद्ध अंतरण भुगतान$ प्रयोज्य आय: $DI = PI - व्यक्तिगत कर$ राष्ट्रीय आय मापन की विधियाँ: उत्पाद विधि (मूल्य वृद्धि विधि): $$GDP_{MP} = \text{प्राथमिक क्षेत्र का सकल मूल्य वृद्धि} + \text{द्वितीयक क्षेत्र का सकल मूल्य वृद्धि} + \text{तृतीयक क्षेत्र का सकल मूल्य वृद्धि}$$ आय विधि: $$GDP_{FC} = \text{कर्मचारियों का पारिश्रमिक} + \text{परिचालन अधिशेष} + \text{स्व-नियोजितों की मिश्रित आय}$$ व्यय विधि: $$GDP_{MP} = \text{निजी अंतिम उपभोग व्यय} + \text{सरकारी अंतिम उपभोग व्यय} + \text{सकल घरेलू पूंजी निर्माण} + \text{शुद्ध निर्यात}$$ 11. मुद्रा और बैंकिंग मुद्रा के कार्य: विनिमय का माध्यम, मूल्य का मापक, मूल्य का संचय, भावी भुगतानों का मानक। मुद्रा पूर्ति (M1): जनता के पास मुद्रा + बैंकों के पास मांग जमा + RBI के पास अन्य जमा। वाणिज्यिक बैंक: जमा स्वीकार करना, ऋण देना। केंद्रीय बैंक (RBI): नोट जारी करने वाला बैंक। सरकार का बैंकर। बैंकों का बैंकर। अंतिम ऋणदाता। विदेशी मुद्रा भंडार का संरक्षक। साख नियंत्रण। साख नियंत्रण के उपकरण: मात्रात्मक: बैंक दर, रेपो दर, रिवर्स रेपो दर, नकद आरक्षित अनुपात (CRR), वैधानिक तरलता अनुपात (SLR), खुले बाजार की क्रियाएं। गुणात्मक: सीमांत आवश्यकता में परिवर्तन, नैतिक दबाव, साख की राशनिंग। 12. आय और रोजगार का निर्धारण समग्र मांग (AD): $AD = C + I + G + (X - M)$ (खुली अर्थव्यवस्था) समग्र पूर्ति (AS): $AS = C + S$ (आय के बराबर) संतुलन: $AD = AS$ या $S = I$ उपभोग फलन: $C = \bar{C} + bY$ (जहाँ $\bar{C}$ स्वायत्त उपभोग, $b$ सीमांत उपभोग प्रवृत्ति (MPC)) सीमांत उपभोग प्रवृत्ति (MPC): आय में परिवर्तन के कारण उपभोग में परिवर्तन। $MPC = \Delta C / \Delta Y$ सीमांत बचत प्रवृत्ति (MPS): आय में परिवर्तन के कारण बचत में परिवर्तन। $MPS = \Delta S / \Delta Y$ $MPC + MPS = 1$ निवेश गुणक (k): निवेश में परिवर्तन के कारण आय में होने वाला कुल परिवर्तन। $$k = \frac{\Delta Y}{\Delta I} = \frac{1}{1 - MPC} = \frac{1}{MPS}$$ पूर्ण रोजगार संतुलन: जब AD, AS को पूर्ण रोजगार स्तर पर काटता है। अल्परोजगार संतुलन: जब AD, AS को पूर्ण रोजगार स्तर से पहले काटता है। अतिरेक मांग: पूर्ण रोजगार स्तर पर AD > AS अभाव मांग: पूर्ण रोजगार स्तर पर AD 13. सरकारी बजट और अर्थव्यवस्था सरकारी बजट: सरकार की अनुमानित प्राप्तियों और व्ययों का एक वित्तीय विवरण। बजट के उद्देश्य: आर्थिक स्थिरता, आय और धन का पुनर्वितरण, संसाधनों का आवंटन, आर्थिक विकास। बजट प्राप्तियां: राजस्व प्राप्तियां: गैर-प्रतिदेय (कर, गैर-कर)। पूंजीगत प्राप्तियां: देयता उत्पन्न करने वाली या परिसंपत्ति कम करने वाली (ऋण वसूली, उधार)। बजट व्यय: राजस्व व्यय: कोई परिसंपत्ति नहीं बनाते या देयता कम नहीं करते (वेतन, सब्सिडी)। पूंजीगत व्यय: परिसंपत्ति बनाते या देयता कम करते (पुलों का निर्माण, ऋणों का पुनर्भुगतान)। बजट घाटा: राजस्व घाटा: राजस्व व्यय > राजस्व प्राप्तियां। राजकोषीय घाटा: कुल व्यय > कुल प्राप्तियां (उधार को छोड़कर)। $$राजकोषीय \ घाटा = कुल \ व्यय - (राजस्व \ प्राप्तियां + ऋणों \ की \ वसूली + अन्य \ पूंजीगत \ प्राप्तियां)$$ प्राथमिक घाटा: राजकोषीय घाटा - ब्याज भुगतान। 14. भुगतान संतुलन और विदेशी विनिमय दर भुगतान संतुलन (BoP): एक देश और शेष विश्व के बीच एक निश्चित अवधि में सभी आर्थिक लेन-देनों का व्यवस्थित रिकॉर्ड। BoP के घटक: चालू खाता: वस्तुओं और सेवाओं का व्यापार, अंतरण भुगतान, निवेश आय। पूंजी खाता: ऋण, निवेश (प्रत्यक्ष, पोर्टफोलियो), बैंकिंग पूंजी। BoP संतुलन: जब चालू खाता और पूंजी खाता एक-दूसरे को संतुलित करते हैं (आधिकारिक आरक्षित लेनदेन को छोड़कर)। भुगतान संतुलन में अधिशेष: BoP में शुद्ध अंतर्वाह। भुगतान संतुलन में घाटा: BoP में शुद्ध बहिर्वाह। विदेशी विनिमय दर: एक मुद्रा की इकाई के बदले में दूसरी मुद्रा की कितनी इकाइयां मिलती हैं। विनिमय दर व्यवस्थाएं: स्थिर विनिमय दर: सरकार द्वारा निर्धारित। लचीली विनिमय दर: बाजार की शक्तियों (मांग और पूर्ति) द्वारा निर्धारित। प्रबंधित लचीली विनिमय दर: बाजार द्वारा निर्धारित लेकिन केंद्रीय बैंक द्वारा हस्तक्षेप के साथ। मुद्रा का मूल्यह्रास: लचीली विनिमय दर प्रणाली में घरेलू मुद्रा का मूल्य गिरना। मुद्रा का अधिमूल्यन: लचीली विनिमय दर प्रणाली में घरेलू मुद्रा का मूल्य बढ़ना। मुद्रा का अवमूल्यन: स्थिर विनिमय दर प्रणाली में सरकार द्वारा घरेलू मुद्रा का मूल्य कम करना। मुद्रा का पुनर्मूल्यन: स्थिर विनिमय दर प्रणाली में सरकार द्वारा घरेलू मुद्रा का मूल्य बढ़ाना।