` बना सकता हूँ, जिससे प्रत्येक फ़ाइल कम जटिल होगी और रेंडर करना आसान होगा। **कृपया मुझे बताएं कि आप कौन सा विकल्प पसंद करेंगे?** फिलहाल, मैं आपको **विकल्प 1** के साथ एक बार फिर से पूरी चीटशीट, सरल, लीनियर HTML संरचना में देता हूँ ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि कोई भी कंटेंट बीच में खाली न दिखे और एक ही प्रवाह में प्रदर्शित हो। मैं ` ` को भी हटा दूंगा क्योंकि यह आमतौर पर लेआउट से संबंधित होता है। यह सुनिश्चित करने के लिए कि आप इसे ठीक से देख सकें, कृपया इसे एक `.html` फ़ाइल के रूप में सहेजें (उदाहरण के लिए, `biology_cheatsheet.html`) और इसे अपने वेब ब्राउज़र (जैसे Chrome, Firefox) में खोलें। --- कक्षा 6: जीव विज्ञान की मूल बातें (Fundamentals of Biology) 1. भोजन: यह कहाँ से आता है? (Food: Where Does It Come From?) भोजन की आवश्यकता: सभी जीवित जीवों को बढ़ने, कार्य करने, चोटों को ठीक करने और स्वस्थ रहने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यह ऊर्जा उन्हें भोजन से मिलती है। भोजन के मुख्य स्रोत: पौधे: हम पौधों से अनाज (गेहूँ, चावल), दालें (चना, अरहर), सब्जियाँ (आलू, टमाटर), फल (आम, सेब), तेल (सरसों, सूरजमुखी) आदि प्राप्त करते हैं। पौधे अपना भोजन सूर्य के प्रकाश का उपयोग करके स्वयं बनाते हैं। जंतु: हमें जंतुओं से दूध (गाय, भैंस), अंडे (मुर्गी), मांस (मुर्गा, मछली), शहद (मधुमक्खी) आदि मिलते हैं। खाद्य सामग्री और उनके स्रोत: खाद्य सामग्री स्रोत (पादप/जंतु) विस्तारित स्रोत चावल पादप धान के पौधे दूध जंतु गाय, भैंस, बकरी शहद जंतु मधुमक्खी (फूलों के रस से) अंडे जंतु मुर्गी, बत्तख सरसों का तेल पादप सरसों के बीज दही जंतु दूध (बैक्टीरिया द्वारा किण्वन) जंतुओं को भोजन के आधार पर वर्गीकृत करना: शाकाहारी (Herbivores): वे जंतु जो केवल पौधे या पौधों के उत्पाद खाते हैं। उदाहरण: गाय, भैंस, बकरी, हिरण, खरगोश। मांसाहारी (Carnivores): वे जंतु जो केवल अन्य जंतुओं का मांस खाते हैं। उदाहरण: शेर, बाघ, भेड़िया, चीता। सर्वाहारी (Omnivores): वे जंतु जो पौधे और जंतु दोनों खाते हैं। उदाहरण: मनुष्य, भालू, कुत्ता, कौआ। 2. पौधों को जानिए (Getting to Know Plants) पौधों के मुख्य भाग और उनके कार्य: जड़ (Root): मिट्टी में पौधे को मजबूती से स्थिर रखती है। मिट्टी से जल और खनिज लवणों का अवशोषण करती है। कुछ पौधों में (जैसे गाजर, मूली) भोजन का भंडारण भी करती है। तना (Stem): पौधे को सीधा खड़ा रखता है और पत्तियों, फूलों तथा फलों को सहारा देता है। जड़ों द्वारा अवशोषित जल और खनिजों को पत्तियों तक पहुँचाता है। पत्तियों द्वारा बनाए गए भोजन को पौधे के अन्य भागों तक पहुँचाता है। पत्ती (Leaf): प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis): पत्तियों में मौजूद हरा वर्णक क्लोरोफिल सूर्य के प्रकाश की ऊर्जा का उपयोग करके कार्बन डाइऑक्साइड और जल से भोजन (ग्लूकोज) बनाता है। यह पौधे की 'रसोई' होती है। वाष्पोत्सर्जन (Transpiration): पत्तियों की निचली सतह पर छोटे-छोटे छिद्र (रंध्र) होते हैं जिनसे अतिरिक्त जल वाष्प के रूप में बाहर निकलता है। यह पौधे को ठंडा रखने और जल को ऊपर खींचने में मदद करता है। फूल (Flower): यह पौधे का प्रजनन अंग है। इसमें नर और मादा दोनों जनन अंग हो सकते हैं। फूलों से ही फल और बीज बनते हैं। फल (Fruit): फूल के अंडाशय से विकसित होता है। बीजों को सुरक्षा प्रदान करता है और उनके प्रकीर्णन (फैलाने) में मदद करता है। पौधों के प्रकार (आकार और तने की प्रकृति के आधार पर): शाक (Herbs): सामान्यतः छोटे होते हैं और इनका तना कोमल, हरा तथा आसानी से मोड़ा जा सकने वाला होता है। इनमें बहुत कम शाखाएँ होती हैं या बिलकुल नहीं होती हैं। उदाहरण: पुदीना, धनिया, टमाटर, गेहूँ। झाड़ी (Shrubs): इनका तना कठोर होता है, लेकिन बहुत मोटा नहीं होता। शाखाएँ तने के आधार (जमीन के पास) से निकलती हैं, जिससे यह घना दिखाई देता है। उदाहरण: गुलाब, नींबू, गुड़हल। वृक्ष (Trees): ये बहुत लंबे और बड़े होते हैं। इनका तना मोटा, कठोर और काष्ठीय (लकड़ी वाला) होता है। शाखाएँ तने के ऊपरी भाग से निकलती हैं। उदाहरण: बरगद, आम, नीम, पीपल। 3. शरीर में गति (Body Movements) जंतुओं में गति की आवश्यकता: भोजन खोजने, आश्रय पाने, शिकारियों से बचने और प्रजनन के लिए। मानव शरीर में गति: अस्थियाँ (Bones): हमारा शरीर हड्डियों के एक मजबूत ढाँचे (कंकाल) से बना है जो शरीर को आकार और सहारा देता है। उपास्थि (Cartilage): यह हड्डियों से नरम होती है और जोड़ों पर पाई जाती है, जैसे कान की नोक या नाक की नोक पर। यह हड्डियों को घिसने से बचाती है। जोड़ (Joints): वे स्थान जहाँ दो या दो से अधिक हड्डियाँ मिलती हैं। जोड़ ही हमें मुड़ने, झुकने और गति करने में मदद करते हैं। कंदुक-खल्लिका जोड़ (Ball and Socket Joint): यह सभी दिशाओं में गति की अनुमति देता है (जैसे कंधे और कूल्हे का जोड़)। हिंज जोड़ (Hinge Joint): यह केवल एक दिशा में आगे-पीछे गति की अनुमति देता है (जैसे कोहनी और घुटने का जोड़)। मांसपेशियाँ (Muscles): ये हड्डियों से जुड़ी होती हैं और इनके संकुचन (सिकुड़ना) और शिथिलन (फैलना) से हड्डियाँ हिलती हैं, जिससे गति होती है। मांसपेशियाँ हमेशा जोड़े में कार्य करती हैं। विभिन्न जंतुओं में गति: केंचुआ (Earthworm): इसका शरीर कई रिंगों (वलयों) से बना होता है। यह अपने शरीर की मांसपेशियों को बारी-बारी से सिकोड़कर और फैलाकर आगे बढ़ता है, जिससे मिट्टी में पकड़ बनती है। घोंघा (Snail): यह एक पेशीय पाद (मांसल पैर) की मदद से धीमी गति से चलता है। यह पाद तरंगों के रूप में गति करता है। तिलचट्टा (Cockroach): इसके शरीर पर एक कठोर बाह्य कंकाल होता है। इसमें तीन जोड़ी पैर होते हैं जो चलने में मदद करते हैं और दो जोड़ी पंख होते हैं जो उड़ने में मदद करते हैं। पक्षी (Birds): इनकी हड्डियाँ खोखली और हल्की होती हैं। इनके अग्रपाद (आगे के पैर) पंखों में रूपांतरित होते हैं, जो उड़ने में मदद करते हैं। इनकी मजबूत छाती की मांसपेशियाँ पंखों को ऊपर-नीचे करने में सहायक होती हैं। मछली (Fish): इनका शरीर धारा रेखीय (streamlined) होता है। ये अपने शरीर के पार्श्व भागों और पूँछ को एक तरफ से दूसरी तरफ घुमाकर तैरती हैं। इनके पंख संतुलन बनाने और दिशा बदलने में मदद करते हैं। सर्प (Snake): इनके शरीर में लंबी रीढ़ की हड्डी और बहुत सारी मांसपेशियाँ होती हैं। ये अपने शरीर को वलयों (लूप्स) में मोड़कर जमीन पर आगे बढ़ते हैं, जिससे जमीन पर पकड़ बनती है। 4. सजीव एवं उनका परिवेश (Living Organisms and Their Surroundings) सजीवों के सामान्य लक्षण: सभी सजीवों में कुछ सामान्य विशेषताएँ होती हैं जो उन्हें निर्जीवों से अलग करती हैं: वृद्धि (Growth): सभी सजीव बढ़ते हैं। गति (Movement): सभी सजीव किसी न किसी रूप में गति करते हैं। श्वसन (Respiration): ऊर्जा प्राप्त करने के लिए श्वसन करते हैं। प्रजनन (Reproduction): अपनी ही जैसी संतान उत्पन्न करते हैं। भोजन ग्रहण करना (Taking Food): ऊर्जा के लिए भोजन ग्रहण करते हैं। उत्सर्जन (Excretion): अपशिष्ट पदार्थों को शरीर से बाहर निकालते हैं। उद्दीपन के प्रति अनुक्रिया (Response to Stimuli): अपने आसपास के परिवर्तनों के प्रति प्रतिक्रिया करते हैं (जैसे प्रकाश, गर्मी, स्पर्श)। आवास (Habitat): वह विशेष स्थान या परिवेश जहाँ कोई जीव रहता है और अपनी सभी आवश्यकताओं (भोजन, आश्रय, प्रजनन) को पूरा करता है। आवास के प्रकार: स्थलीय आवास (Terrestrial Habitats): वे आवास जो भूमि पर पाए जाते हैं। वन (Forests): घने पेड़, विभिन्न प्रकार के जंतु। घास के मैदान (Grasslands): मुख्य रूप से घास से ढके, शाकाहारी जंतुओं के लिए उपयुक्त। रेगिस्तान (Deserts): बहुत कम वर्षा, गर्म या ठंडे हो सकते हैं। पर्वतीय क्षेत्र (Mountain Regions): ठंडे, ऊँचाई पर कम ऑक्सीजन। जलीय आवास (Aquatic Habitats): वे आवास जो जल में पाए जाते हैं। तालाब और झीलें (Ponds and Lakes): मीठे पानी के आवास। नदियाँ (Rivers): बहते पानी के आवास। समुद्र और महासागर (Seas and Oceans): खारे पानी के विशाल आवास। अनुकूलन (Adaptation): किसी जीव के शरीर में उपस्थित वे विशेष संरचनाएँ, कार्य या व्यवहार जो उसे अपने विशेष आवास में जीवित रहने और पनपने में मदद करते हैं। अनुकूलन हजारों वर्षों में धीरे-धीरे विकसित होते हैं। रेगिस्तानी पौधों में अनुकूलन: पत्तियाँ अक्सर काँटों में रूपांतरित हो जाती हैं या बहुत छोटी होती हैं ताकि पानी की हानि (वाष्पोत्सर्जन) कम हो। तना मांसल और हरा होता है, जो पानी का भंडारण करता है और प्रकाश संश्लेषण भी करता है (जैसे कैक्टस)। जड़ें बहुत गहरी होती हैं ताकि पानी की तलाश कर सकें। रेगिस्तानी जंतुओं में अनुकूलन: ऊँट के पैर लंबे होते हैं जो उसके शरीर को रेत की गर्मी से दूर रखते हैं। यह एक बार में बहुत सारा पानी पी सकता है और इसे लंबे समय तक बिना पानी के रह सकता है। रेगिस्तानी चूहे और साँप दिन की तेज गर्मी से बचने के लिए बिलों में रहते हैं और रात में बाहर निकलते हैं। पर्वतीय क्षेत्र के जंतुओं में अनुकूलन: इनके शरीर पर मोटे फर या त्वचा होती है जो उन्हें ठंड से बचाती है (जैसे याक, पहाड़ी बकरी)। इनके खुर मजबूत होते हैं जो उन्हें पथरीले ढलानों पर चलने में मदद करते हैं। जलीय जंतुओं में अनुकूलन: मछली के शरीर पर गलफड़े होते हैं जिनसे वे पानी में घुली ऑक्सीजन ले सकती हैं। इनका शरीर धारा रेखीय होता है जो पानी में आसानी से तैरने में मदद करता है। कुछ जलीय पौधों की पत्तियाँ चौड़ी और चपटी होती हैं जो पानी की सतह पर तैरती हैं, जबकि कुछ के पत्तियाँ पतली और कटी हुई होती हैं ताकि पानी के बहाव से टूटें नहीं। कक्षा 7: पौधों और जंतुओं में जीवन प्रक्रियाएँ (Life Processes in Plants and Animals) 1. पादपों में पोषण (Nutrition in Plants) पोषण: भोजन ग्रहण करने और उसका उपयोग करने की प्रक्रिया। पोषण के तरीके: स्वपोषी पोषण (Autotrophic Nutrition): वे जीव जो अपना भोजन स्वयं बनाते हैं, स्वपोषी कहलाते हैं (जैसे हरे पौधे, कुछ शैवाल)। प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis): हरे पौधों द्वारा सूर्य के प्रकाश की ऊर्जा का उपयोग करके कार्बन डाइऑक्साइड ($CO_2$) और जल ($H_2O$) से अपना भोजन (ग्लूकोज) बनाने की प्रक्रिया। इस प्रक्रिया में ऑक्सीजन ($O_2$) एक उप-उत्पाद के रूप में निकलती है। समीकरण: $6CO_2 + 6H_2O \xrightarrow{\text{सूर्य का प्रकाश, क्लोरोफिल}} C_6H_{12}O_6 + 6O_2$ आवश्यक घटक: कार्बन डाइऑक्साइड: पत्तियों में रंध्रों (छोटे छिद्रों) के माध्यम से वायुमंडल से प्राप्त। जल: जड़ों द्वारा मिट्टी से अवशोषित। सूर्य का प्रकाश: ऊर्जा का स्रोत। क्लोरोफिल: पत्तियों में मौजूद हरा वर्णक जो सूर्य के प्रकाश को अवशोषित करता है (यह क्लोरोप्लास्ट नामक कोशिका अंग में पाया जाता है)। उत्पाद: ग्लूकोज ($C_6H_{12}O_6$): पौधे का भोजन (बाद में स्टार्च के रूप में संग्रहित)। ऑक्सीजन ($O_2$): वायुमंडल में मुक्त होती है, जो जंतुओं के श्वसन के लिए आवश्यक है। विषमपोषी पोषण (Heterotrophic Nutrition): वे जीव जो अपना भोजन स्वयं नहीं बना सकते और भोजन के लिए दूसरे जीवों पर निर्भर रहते हैं, विषमपोषी कहलाते हैं। परजीवी (Parasitic): वे जीव जो दूसरे जीवित जीव (पोषक) से अपना पोषण प्राप्त करते हैं, उसे नुकसान पहुँचाते हैं लेकिन मारते नहीं हैं। उदाहरण: अमरबेल (Cuscuta) एक परजीवी पौधा है जो दूसरे पौधों से पोषण चूसता है। जंतुओं में जूँ, मच्छर, फीताकृमि। मृतजीवी (Saprophytic): वे जीव जो मृत और सड़े हुए कार्बनिक पदार्थों से अपना पोषण प्राप्त करते हैं। उदाहरण: कवक (Fungi) जैसे मशरूम, यीस्ट, और कुछ बैक्टीरिया। ये अपघटक के रूप में पर्यावरण को साफ रखने में मदद करते हैं। कीटभक्षी पौधे (Insectivorous Plants): ये पौधे हरे होते हैं और प्रकाश संश्लेषण करते हैं, लेकिन नाइट्रोजन की कमी को पूरा करने के लिए कीड़ों को पकड़कर खाते हैं। उदाहरण: घटपर्णी (Pitcher Plant), वीनस फ्लाईट्रैप। 2. जंतुओं में पोषण (Nutrition in Animals) पोषण के चरण (मानव के संदर्भ में): अंतर्ग्रहण (Ingestion): भोजन को शरीर के अंदर लेना (मुख द्वारा)। पाचन (Digestion): जटिल खाद्य पदार्थों को सरल, घुलनशील पदार्थों में तोड़ना। अवशोषण (Absorption): पचे हुए भोजन को रक्त में मिलाना। स्वांगीकरण (Assimilation): अवशोषित भोजन को शरीर के विभिन्न भागों द्वारा ऊर्जा और वृद्धि के लिए उपयोग करना। बहिष्करण (Egestion): अपचित भोजन को शरीर से बाहर निकालना। मानव में पाचन तंत्र (Human Digestive System): मुख गुहा (Buccal Cavity): दांत: भोजन को चबाना और छोटे टुकड़ों में तोड़ना (यांत्रिक पाचन)। लार ग्रंथियाँ: लार का स्राव करती हैं, जिसमें एमाइलेज एंजाइम होता है जो स्टार्च का पाचन शुरू करता है (रासायनिक पाचन)। ग्रासनली (Oesophagus): भोजन को मुख से आमाशय तक पहुँचाने वाली नली। इसमें क्रमाकुंचन (peristalsis) नामक तरंग जैसी गति होती है। आमाशय (Stomach): J-आकार का अंग। आमाशयी रस (गैस्ट्रिक जूस) स्रावित करता है जिसमें हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCl) और पेप्सिन एंजाइम होता है। HCl भोजन को अम्लीय बनाता है और जीवाणुओं को मारता है, पेप्सिन प्रोटीन का पाचन शुरू करता है। छोटी आँत (Small Intestine): लगभग 6-7 मीटर लंबी, अत्यधिक कुंडलित नली। यह पाचन तंत्र का मुख्य स्थल है जहाँ भोजन का पूर्ण पाचन और अवशोषण होता है। यकृत से पित्त रस और अग्न्याशय से अग्नाशयी रस इसमें आते हैं जो पाचन में मदद करते हैं। इसकी आंतरिक दीवार पर उंगली जैसी संरचनाएँ (विली) होती हैं जो अवशोषण के लिए सतह क्षेत्र बढ़ाती हैं। बड़ी आँत (Large Intestine): छोटी आँत से छोटी लेकिन चौड़ी। मुख्य कार्य अपचित भोजन से जल और कुछ लवणों का अवशोषण करना। अपचित भोजन फिर मलाशय में जमा होता है और गुदा (Anus) के माध्यम से बाहर निकाल दिया जाता है। सहायक पाचक ग्रंथियाँ: यकृत (Liver): शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि। पित्त रस (Bile juice) का उत्पादन करती है जो वसा के पाचन (इमल्सीकरण) में सहायक है। अग्न्याशय (Pancreas): अग्नाशयी रस (Pancreatic juice) का स्राव करती है जिसमें कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और वसा को पचाने वाले एंजाइम होते हैं। घास खाने वाले जंतुओं में पाचन (Digestion in Grass-Eating Animals - Ruminants): गाय, भैंस जैसे जंतुओं को रोमंथी (Ruminants) कहते हैं। इनके आमाशय का एक भाग रूमेन (Rumen) कहलाता है। ये तेजी से घास निगलते हैं और उसे रूमेन में जमा कर लेते हैं। रूमेन में भोजन का आंशिक पाचन होता है जिसे जुगाल (Cud) कहते हैं। बाद में, जंतु इस जुगाल को मुख में वापस लाकर धीरे-धीरे चबाते हैं (जुगाली करना)। यह प्रक्रिया सेलूलोज के पाचन में मदद करती है, जो घास में प्रचुर मात्रा में होता है। अमीबा में पोषण (Nutrition in Amoeba): अमीबा एककोशिकीय जीव है। यह अपने पादाभ (pseudopodia - अस्थायी पैर जैसी संरचनाएँ) का उपयोग करके भोजन को घेरता है। भोजन एक खाद्य रसधानी (food vacuole) के अंदर बंद हो जाता है, जहाँ पाचक एंजाइम भोजन को पचाते हैं। पचा हुआ भोजन अवशोषित हो जाता है और अपचित भोजन को कोशिका से बाहर निकाल दिया जाता है। 3. रेशों से वस्त्र तक (Fibre to Fabric) - (आंशिक रूप से जीव विज्ञान) जंतु रेशे (Animal Fibres): वे रेशे जो जंतुओं से प्राप्त होते हैं। ऊन (Wool): यह भेड़, याक, बकरी, ऊँट, लामा और अल्पाका जैसे जंतुओं के बालों से प्राप्त होता है। इन जंतुओं के शरीर पर घने बाल होते हैं जो उन्हें ठंड से बचाते हैं। ऊन प्राप्त करने के लिए बालों को काटा जाता है, धोया जाता है, सुखाया जाता है और फिर संसाधित किया जाता है। रेशम (Silk): यह रेशम कीट (Silkworm) के कोकून से प्राप्त होता है। रेशम कीट पालन को सेरीकल्चर (Sericulture) कहते हैं। रेशम कीट का जीवन चक्र (Life Cycle of Silk Moth): अंडा (Egg): मादा रेशम कीट शहतूत की पत्तियों पर अंडे देती है। लार्वा (Larva) / कैटरपिलर (Caterpillar): अंडे से लार्वा निकलता है जिसे कैटरपिलर कहते हैं। यह शहतूत की पत्तियों को खाता है और तेजी से बढ़ता है। प्यूपा (Pupa) / कोकून (Cocoon): कैटरपिलर अपने चारों ओर प्रोटीन से बने रेशे का एक सुरक्षात्मक आवरण बुनता है जिसे कोकून कहते हैं। इसी कोकून से रेशम का धागा प्राप्त होता है। वयस्क कीट (Adult Moth): कोकून के अंदर प्यूपा विकसित होता है और अंत में एक वयस्क रेशम कीट बाहर निकलता है। 4. जीवों में श्वसन (Respiration in Organisms) श्वसन (Respiration): वह प्रक्रिया जिसके द्वारा भोजन से ऊर्जा मुक्त की जाती है। यह कोशिका के अंदर होती है। श्वसन के प्रकार: वायवीय श्वसन (Aerobic Respiration): यह ऑक्सीजन ($O_2$) की उपस्थिति में होता है। इसमें भोजन (ग्लूकोज) का पूर्ण विखंडन होता है और अधिक मात्रा में ऊर्जा मुक्त होती है। उत्पाद: कार्बन डाइऑक्साइड ($CO_2$), जल ($H_2O$) और ऊर्जा। समीकरण: $C_6H_{12}O_6 + 6O_2 \rightarrow 6CO_2 + 6H_2O + \text{ऊर्जा}$ उदाहरण: अधिकांश जंतुओं और पौधों में। अवायवीय श्वसन (Anaerobic Respiration): यह ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में होता है। इसमें भोजन का अपूर्ण विखंडन होता है और बहुत कम मात्रा में ऊर्जा मुक्त होती है। उत्पाद: यीस्ट में: अल्कोहल, कार्बन डाइऑक्साइड और ऊर्जा (किण्वन)। मांसपेशियों में (ऑक्सीजन की कमी होने पर): लैक्टिक अम्ल और ऊर्जा। लैक्टिक अम्ल के जमाव से मांसपेशियों में ऐंठन होती है। समीकरण (यीस्ट में): $C_6H_{12}O_6 \rightarrow 2C_2H_5OH + 2CO_2 + \text{ऊर्जा}$ समीकरण (मांसपेशियों में): $C_6H_{12}O_6 \rightarrow 2CH_3CH(OH)COOH + \text{ऊर्जा}$ मानव में श्वसन तंत्र (Human Respiratory System): नासिका छिद्र (Nostrils): वायु अंदर जाती है, बालों और श्लेष्मा द्वारा छनी जाती है। ग्रसनी (Pharynx): मुख और नासिका मार्ग को जोड़ती है। श्वासनली (Trachea) / विंडपाइप (Windpipe): वायु को फेफड़ों तक ले जाती है। इसमें उपास्थि के छल्ले होते हैं जो इसे ढहने से रोकते हैं। श्वसनी (Bronchi): श्वासनली दो भागों में बँटकर फेफड़ों में प्रवेश करती है। फेफड़े (Lungs): छाती गुहा में स्थित, मुख्य श्वसन अंग। यहाँ ऑक्सीजन रक्त में मिलती है और कार्बन डाइऑक्साइड रक्त से बाहर निकलती है। श्वसन क्रियाविधि: श्वास लेना (Inhalation): डायफ्राम नीचे जाता है और पसलियाँ ऊपर व बाहर आती हैं, जिससे छाती गुहा का आयतन बढ़ता है और वायु फेफड़ों में भर जाती है। श्वास छोड़ना (Exhalation): डायफ्राम ऊपर आता है और पसलियाँ नीचे व अंदर आती हैं, जिससे छाती गुहा का आयतन घटता है और वायु फेफड़ों से बाहर निकल जाती है। अन्य जंतुओं में श्वसन: केंचुआ: इसकी त्वचा नम और श्लेष्मीय होती है, जिसके माध्यम से यह गैसीय विनिमय करता है। मछली: इनके पास गलफड़े (Gills) होते हैं। ये मुख से पानी लेती हैं, जो गलफड़ों के ऊपर से गुजरता है। गलफड़ों में मौजूद रक्त वाहिकाएँ पानी में घुली ऑक्सीजन को अवशोषित करती हैं और कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ती हैं। तिलचट्टा और अन्य कीट: इनके शरीर के पार्श्व भागों पर छोटे-छोटे छिद्र (श्वास रंध्र) होते हैं। इन छिद्रों से वायु श्वास नली (Tracheal System) नामक नलिकाओं के जाल में प्रवेश करती है और सीधे कोशिकाओं तक पहुँचती है। पौधों में श्वसन: रंध्रों (पत्तियों पर) और लेन्टिसेल (तने पर) के माध्यम से। 5. जंतुओं और पादपों में परिवहन (Transportation in Animals and Plants) परिवहन: पदार्थों (जैसे भोजन, जल, ऑक्सीजन, अपशिष्ट) को शरीर के एक भाग से दूसरे भाग तक ले जाने की प्रक्रिया। जंतुओं में परिवहन (मानव के संदर्भ में): रक्त परिसंचरण तंत्र (Blood Circulatory System): यह तंत्र हृदय, रक्त वाहिकाओं और रक्त से बना होता है। रक्त (Blood): एक तरल संयोजी ऊतक है जो शरीर में पदार्थों का परिवहन करता है। घटक: प्लाज्मा (Plasma): रक्त का तरल भाग, जिसमें जल, प्रोटीन, हार्मोन आदि होते हैं। पोषक तत्वों, अपशिष्टों आदि का परिवहन करता है। लाल रक्त कोशिकाएँ (RBCs) / एरिथ्रोसाइट्स: इनमें हीमोग्लोबिन होता है जो ऑक्सीजन का परिवहन करता है। श्वेत रक्त कोशिकाएँ (WBCs) / ल्यूकोसाइट्स: शरीर को संक्रमण से बचाती हैं (प्रतिरक्षा प्रणाली का हिस्सा)। प्लेटलेट्स (Platelets) / बिम्बाणु: रक्त का थक्का बनाने में मदद करती हैं। रक्त वाहिकाएँ (Blood Vessels): रक्त को पूरे शरीर में ले जाने वाली नलिकाएँ। धमनी (Arteries): हृदय से ऑक्सीजन युक्त रक्त को शरीर के विभिन्न अंगों तक ले जाती हैं (फुफ्फुसीय धमनी को छोड़कर)। इनकी दीवारें मोटी और लचीली होती हैं। शिरा (Veins): शरीर के विभिन्न अंगों से कार्बन डाइऑक्साइड युक्त रक्त को हृदय तक वापस लाती हैं (फुफ्फुसीय शिरा को छोड़कर)। इनकी दीवारें पतली होती हैं और इनमें वाल्व होते हैं जो रक्त को एक ही दिशा में बहने देते हैं। केशिकाएँ (Capillaries): ये बहुत पतली नलिकाएँ होती हैं जो धमनियों को शिराओं से जोड़ती हैं। यहाँ कोशिकाओं और रक्त के बीच ऑक्सीजन, पोषक तत्वों और अपशिष्ट पदार्थों का आदान-प्रदान होता है। हृदय (Heart): एक पेशीय अंग जो रक्त को पूरे शरीर में पंप करता है। मानव हृदय में चार कक्ष होते हैं: दो अलिंद (ऊपरी कक्ष) और दो निलय (निचले कक्ष)। हृदय स्पंदन (Heartbeat): हृदय की मांसपेशियों का लयबद्ध संकुचन और शिथिलन। नाड़ी दर (Pulse Rate): प्रति मिनट हृदय स्पंदन की संख्या, जिसे कलाई या गर्दन पर महसूस किया जा सकता है। पादपों में परिवहन (Transportation in Plants): संवहन ऊतक (Vascular Tissues): पौधों में जल और भोजन के परिवहन के लिए विशेष ऊतक होते हैं। जाइलम (Xylem): जड़ों द्वारा अवशोषित जल और खनिज लवणों को पौधे के सभी भागों (विशेषकर पत्तियों तक) पहुँचाता है। यह एकतरफा (नीचे से ऊपर) परिवहन होता है। फ्लोएम (Phloem): पत्तियों में प्रकाश संश्लेषण द्वारा बनाए गए भोजन को पौधे के अन्य भागों (जड़ों, फलों, भंडारण अंगों) तक पहुँचाता है। यह द्विदिशात्मक (ऊपर और नीचे दोनों) परिवहन होता है। वाष्पोत्सर्जन (Transpiration): पत्तियों से जल का वाष्प के रूप में निकलना। यह एक चूषण खिंचाव (suction pull) पैदा करता है जो जाइलम के माध्यम से जल को ऊपर की ओर खींचने में मदद करता है। 6. जंतुओं में उत्सर्जन (Excretion in Animals) उत्सर्जन (Excretion): शरीर से उपापचयी (metabolic) अपशिष्ट उत्पादों को बाहर निकालने की प्रक्रिया। ये अपशिष्ट पदार्थ शरीर के लिए हानिकारक हो सकते हैं। मानव में उत्सर्जन तंत्र (Human Excretory System): वृक्क (Kidneys): एक जोड़ी सेम के आकार के अंग जो पेट के निचले हिस्से में रीढ़ की हड्डी के दोनों ओर स्थित होते हैं। ये रक्त को छानते हैं और अपशिष्ट उत्पादों (यूरिया, अतिरिक्त लवण, अतिरिक्त जल) को हटाकर मूत्र बनाते हैं। मूत्रवाहिनी (Ureters): प्रत्येक वृक्क से एक नली निकलती है जो मूत्र को वृक्क से मूत्राशय तक ले जाती है। मूत्राशय (Urinary Bladder): एक पेशीय थैली जो मूत्र को अस्थायी रूप से संग्रहित करती है। मूत्रमार्ग (Urethra): मूत्राशय से एक नली निकलती है जो मूत्र को शरीर से बाहर निकालती है। अपोहन (Dialysis) / कृत्रिम वृक्क (Artificial Kidney): जब किसी व्यक्ति के वृक्क ठीक से काम नहीं करते हैं, तो रक्त को एक मशीन द्वारा छाना जाता है। इस प्रक्रिया को अपोहन कहते हैं। अन्य जंतुओं में उत्सर्जन: अमीबा: कोशिका की सतह से विसरण (diffusion) द्वारा अपशिष्टों को बाहर निकालता है। मछली: गलफड़ों और वृक्कों द्वारा अपशिष्टों को बाहर निकालती है। पक्षी: यूरिक अम्ल के रूप में अपशिष्ट निकालते हैं, जिसमें बहुत कम पानी की आवश्यकता होती है। 7. पादपों में जनन (Reproduction in Plants) जनन (Reproduction): वह जैविक प्रक्रिया जिसके द्वारा जीव अपनी ही जैसी नई संतान उत्पन्न करते हैं। यह प्रजाति की निरंतरता सुनिश्चित करता है। जनन के प्रकार: अलैंगिक जनन (Asexual Reproduction): इसमें केवल एक ही जनक भाग लेता है। उत्पन्न संतान आनुवंशिक रूप से जनक के समान होती है (क्लोन)। तरीके: कायिक प्रवर्धन (Vegetative Propagation): पौधे के कायिक भागों (जड़, तना, पत्ती) से नया पौधा उगना (जैसे आलू, गुलाब, ब्रायोफिलम)। मुकुलन (Budding): यीस्ट में। खंडन (Fragmentation): स्पाइरोगाइरा में। बीजाणु निर्माण (Spore Formation): फर्न, मॉस में। लैंगिक जनन (Sexual Reproduction): नर और मादा दोनों जनकों की भागीदारी, युग्मकों का संलयन। उत्पन्न संतान आनुवंशिक रूप से दोनों जनकों से भिन्न होती है (विविधता)। पुष्पी पौधों में लैंगिक जनन: पुष्प की संरचना: बाह्यदल (Sepals): हरे रंग की पत्ती जैसी संरचनाएँ जो कली अवस्था में फूल की रक्षा करती हैं। दल (Petals): रंगीन और सुगंधित होते हैं जो परागणकों (कीटों) को आकर्षित करते हैं। पुंकेसर (Stamen): नर जननांग। इसमें परागकोष (Anther) होता है जो परागकण (Pollen Grains) उत्पन्न करता है, और पुतंतु (Filament) होता है। स्त्रीकेसर (Pistil/Carpel): मादा जननांग। इसमें वर्तिकाग्र (Stigma) (परागकणों को ग्रहण करता है), वर्तिका (Style) (परागकणों को अंडाशय तक पहुँचाने वाली नली), और अंडाशय (Ovary) (जिसमें बीजांड होते हैं) होते हैं। परागण (Pollination): परागकणों का परागकोष से वर्तिकाग्र तक स्थानांतरण (स्वपरागण, परपरागण)। निषेचन (Fertilization): नर युग्मक (परागकण से) और मादा युग्मक (बीजांड के अंदर) का संलयन। इस प्रक्रिया से युग्मनज बनता है। बीज और फल का निर्माण: निषेचन के बाद, अंडाशय फल में विकसित होता है और बीजांड बीज में विकसित होते हैं। बीज प्रकीर्णन (Seed Dispersal): बीजों का अपने जनक पौधे से दूर स्थानों पर बिखरना। यह नए पौधों को उगने के लिए पर्याप्त स्थान, धूप और पानी प्राप्त करने में मदद करता है। तरीके: पवन द्वारा: हल्के और पंखदार बीज (जैसे सहजन, कपास)। जल द्वारा: जल में तैरने वाले बीज (जैसे नारियल)। जंतुओं द्वारा: कांटेदार या हुक वाले बीज जो जंतुओं के शरीर से चिपक जाते हैं, या मांसल फल जो जंतुओं द्वारा खाए जाते हैं और बीज मल के साथ बाहर निकल जाते हैं। विस्फोट द्वारा: कुछ फल पकने पर फट जाते हैं और बीज दूर बिखर जाते हैं (जैसे एरंड)। कक्षा 8: सूक्ष्मजीव, फसल उत्पादन और संरक्षण (Microorganisms, Crop Production and Conservation) 1. फसल उत्पादन एवं प्रबंधन (Crop Production and Management) फसल (Crop): जब एक ही प्रकार के पौधे किसी बड़े क्षेत्र में बड़े पैमाने पर उगाए जाते हैं, तो उसे फसल कहते हैं। फसल के प्रकार (जलवायु के आधार पर भारत में): खरीफ फसलें (Kharif Crops): ये फसलें वर्षा ऋतु (जून से सितंबर) में बोई जाती हैं। उदाहरण: धान (चावल), मक्का, सोयाबीन, मूंगफली, कपास। रबी फसलें (Rabi Crops): ये फसलें शीत ऋतु (अक्टूबर से मार्च) में बोई जाती हैं। उदाहरण: गेहूँ, चना, मटर, सरसों, अलसी। फसल उत्पादन के मूल तरीके (Basic Practices of Crop Production): मिट्टी तैयार करना (Preparation of Soil): जुताई (Ploughing): मिट्टी को पलटना और ढीला करना। इससे जड़ों को गहराई तक जाने और श्वसन करने में मदद मिलती है। मिट्टी ढीली होने से जल धारण क्षमता बढ़ती है और सूक्ष्मजीवों की वृद्धि को बढ़ावा मिलता है। बुवाई (Sowing): खेतों में बीज बोना। अच्छी गुणवत्ता वाले स्वच्छ और स्वस्थ बीजों का चयन महत्वपूर्ण है। बीजों को उचित गहराई और दूरी पर बोना चाहिए। खाद एवं उर्वरक देना (Adding Manure and Fertilizers): खाद (Manure): जैविक पदार्थ (गोबर, पौधों के अवशेष) जो मिट्टी को पोषक तत्व और ह्यूमस प्रदान करते हैं। यह मिट्टी की जल धारण क्षमता को बढ़ाता है। उर्वरक (Fertilizers): रासायनिक पदार्थ जो विशेष पोषक तत्व (जैसे नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटेशियम - NPK) प्रदान करते हैं। ये कारखानों में बनते हैं। सिंचाई (Irrigation): पौधों को नियमित अंतराल पर पानी देना। पारंपरिक तरीके: रहट, चेन पंप, ढेकली, मोट। आधुनिक तरीके: छिड़काव तंत्र (sprinkler system), ड्रिप तंत्र (drip system)। खरपतवार से सुरक्षा (Protection from Weeds): खरपतवार (Weeds): फसल के साथ उगने वाले अवांछित पौधे। ये फसल के पोषक तत्वों, जल और प्रकाश के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। खरपतवारनाशी (Weeding): खरपतवारों को हटाने की प्रक्रिया। यह हाथ से, खुरपी से या खरपतवारनाशक रसायनों (जैसे 2,4-D) का उपयोग करके की जा सकती है। कटाई (Harvesting): फसल के पक जाने पर उसे काटना। यह हाथ से दरांती द्वारा या मशीनों (हार्वेस्टर) द्वारा की जाती है। भंडारण (Storage): कटी हुई फसल (अनाज) को नमी, कीटों, चूहों और सूक्ष्मजीवों से बचाने के लिए सुरक्षित रूप से संग्रहित करना। नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Nitrogen Fixation): वायुमंडल में नाइट्रोजन गैस ($N_2$) प्रचुर मात्रा में होती है, लेकिन पौधे इसे सीधे उपयोग नहीं कर सकते। कुछ बैक्टीरिया (जैसे दलहनी पौधों की जड़ों में पाए जाने वाले राइजोबियम) वायुमंडलीय नाइट्रोजन को नाइट्रेट जैसे उपयोगी यौगिकों में बदलते हैं, जिन्हें पौधे अवशोषित कर सकते हैं। यह प्रक्रिया मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाती है। 2. सूक्ष्मजीव: मित्र एवं शत्रु (Microorganisms: Friend and Foe) सूक्ष्मजीव (Microorganisms / Microbes): बहुत छोटे जीव जिन्हें नग्न आँखों से नहीं देखा जा सकता। इन्हें देखने के लिए सूक्ष्मदर्शी (microscope) की आवश्यकता होती है। सूक्ष्मजीवों के मुख्य समूह: बैक्टीरिया (Bacteria): एककोशिकीय, विभिन्न आकार (जैसे रॉड, गोलाकार, सर्पिल)। कवक (Fungi): बहुकोशिकीय (मशरूम, मोल्ड) या एककोशिकीय (यीस्ट)। प्रोटोजोआ (Protozoa): एककोशिकीय जंतु जैसे जीव (जैसे अमीबा, पैरामीशियम)। शैवाल (Algae): पादप जैसे जीव, स्वपोषी (जैसे स्पाइरोगाइरा, नीले-हरे शैवाल)। वायरस (Viruses): ये अन्य सूक्ष्मजीवों से भिन्न होते हैं क्योंकि ये केवल मेजबान कोशिका (host cell) के अंदर ही प्रजनन करते हैं। ये सजीव और निर्जीव के बीच की कड़ी हैं। उपयोगी सूक्ष्मजीव (Friendly Microorganisms): दही निर्माण (Curd Formation): लैक्टोबैसिलस (Lactobacillus) नामक बैक्टीरिया दूध में लैक्टोज को लैक्टिक अम्ल में बदलकर दही बनाता है। ब्रेड और केक बनाना (Baking): यीस्ट (एक कवक) तेजी से प्रजनन करता है और श्वसन के दौरान कार्बन डाइऑक्साइड गैस उत्पन्न करता है, जिससे आटा फूलता है और ब्रेड हल्की बनती है। अल्कोहल, शराब और एसिटिक अम्ल का उत्पादन (Alcohol, Wine, Acetic Acid Production): यीस्ट द्वारा चीनी के किण्वन (fermentation) से अल्कोहल बनता है। औषधि उत्पादन (Medicinal Use): एंटीबायोटिक्स (Antibiotics): ये ऐसी दवाएँ हैं जो बीमारी पैदा करने वाले सूक्ष्मजीवों को मारती हैं या उनकी वृद्धि को रोकती हैं। उदाहरण: पेनिसिलिन (पेनिसिलियम नामक कवक से प्राप्त), स्ट्रेप्टोमाइसिन। टीका (Vaccine): यह शरीर को किसी विशेष बीमारी के खिलाफ प्रतिरक्षा विकसित करने में मदद करता है। मृत या कमजोर सूक्ष्मजीवों का उपयोग करके टीके बनाए जाते हैं। कृषि में उपयोग (Agricultural Use): नाइट्रोजन स्थिरीकरण: राइजोबियम बैक्टीरिया और नीले-हरे शैवाल वायुमंडलीय नाइट्रोजन को मिट्टी में स्थिर करते हैं, जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है। पर्यावरण की सफाई (Cleaning the Environment): बैक्टीरिया और कवक अपघटक (decomposers) के रूप में कार्य करते हैं, मृत पौधों, जंतुओं और अन्य कार्बनिक कचरे को सरल पदार्थों में तोड़ते हैं, जिससे पर्यावरण साफ रहता है। हानिकारक सूक्ष्मजीव (Harmful Microorganisms): रोग उत्पन्न करना (Causing Diseases): सूक्ष्मजीव जो रोग उत्पन्न करते हैं, रोगाणु (pathogens) कहलाते हैं। सूक्ष्मजीव का प्रकार मानव रोग पादप रोग जंतु रोग बैक्टीरिया हैजा, टायफाइड, टीबी (क्षय रोग), एंथ्रेक्स गेहूँ का रस्ट, साइट्रस कैंकर एंथ्रेक्स (मवेशियों में) वायरस जुकाम, फ्लू, पोलियो, खसरा, चिकनपॉक्स, हेपेटाइटिस बी पीली शिरा मोज़ेक (भिंडी में) खुरपका-मुँहपका रोग प्रोटोजोआ मलेरिया (प्लाज्मोडियम द्वारा), अमीबी पेचिश - - कवक दाद, खाज (त्वचा रोग) गेहूँ का रस्ट - खाद्य विषाक्तता (Food Poisoning): कुछ सूक्ष्मजीव भोजन में विषैले पदार्थ उत्पन्न करते हैं, जिससे भोजन दूषित हो जाता है। ऐसा भोजन खाने से गंभीर बीमारी या मृत्यु भी हो सकती है। भोजन का खराब होना (Spoilage of Food): सूक्ष्मजीव भोजन को खराब करते हैं, जिससे उसका रंग, गंध और स्वाद बदल जाता है। खाद्य परिरक्षण (Food Preservation): भोजन को सूक्ष्मजीवों द्वारा खराब होने से बचाने के तरीके। रासायनिक विधियाँ: नमक और खाद्य तेल, सोडियम बेंजोएट, सोडियम मेटाबाइसल्फाइट जैसे परिरक्षकों का उपयोग। नमक और चीनी द्वारा परिरक्षण: मांस, मछली, अचार, मुरब्बा में। तेल और सिरका द्वारा परिरक्षण: अचार, सब्जियाँ, फल। गर्म और ठंडा करना: दूध को उबालना, रेफ्रिजरेटर में रखना। पाश्चुरीकरण (Pasteurization): दूध को लगभग $70^\circ C$ पर 15-30 सेकंड के लिए गर्म करके फिर तुरंत ठंडा करना, जिससे सूक्ष्मजीवों की वृद्धि रुक जाती है (लुई पाश्चर द्वारा विकसित)। वायुरोधी पैकिंग: हवा के संपर्क को रोककर सूक्ष्मजीवों की वृद्धि को रोकना। 3. जंतुओं में जनन (Reproduction in Animals) जनन (Reproduction): वह प्रक्रिया जिसके द्वारा जंतु अपनी ही जैसी संतान उत्पन्न करते हैं। जनन के प्रकार: अलैंगिक जनन (Asexual Reproduction): केवल एक जनक से नई संतान उत्पन्न होती है। संतान आनुवंशिक रूप से जनक के समान होती है। उदाहरण: मुकुलन (Budding): हाइड्रा में, जनक शरीर पर एक मुकुल बनता है जो विकसित होकर अलग हो जाता है। द्विखंडन (Binary Fission): अमीबा में, एक कोशिका दो बराबर भागों में विभाजित होकर दो नए जीव बनाती है। लैंगिक जनन (Sexual Reproduction): नर और मादा दोनों जनक भाग लेते हैं। नर युग्मक (शुक्राणु) और मादा युग्मक (अंडाणु) का संलयन होता है। संतान में दोनों जनकों के लक्षण होते हैं, जिससे विविधता आती है। निषेचन (Fertilization): नर युग्मक (शुक्राणु) और मादा युग्मक (अंडाणु) के संलयन की प्रक्रिया। इससे युग्मनज (zygote) बनता है, जो बाद में भ्रूण (embryo) में विकसित होता है। निषेचन के प्रकार: आंतरिक निषेचन (Internal Fertilization): यह मादा शरीर के अंदर होता है। उदाहरण: मनुष्य, गाय, मुर्गी, कुत्ते। बाह्य निषेचन (External Fertilization): यह मादा शरीर के बाहर, आमतौर पर पानी में होता है। उदाहरण: मछली, मेंढक, सितारा मछली। संवहन के आधार पर जंतुओं का वर्गीकरण: जरायुज जंतु (Viviparous Animals): वे जंतु जो सीधे शिशु को जन्म देते हैं। उदाहरण: मनुष्य, गाय, कुत्ते, बिल्ली। अंडप्रजक जंतु (Oviparous Animals): वे जंतु जो अंडे देते हैं। उदाहरण: मुर्गी, मेंढक, मछली, छिपकली। कायांतरण (Metamorphosis): कुछ जंतुओं में, अंडे से निकलने वाला लार्वा वयस्क जंतु से बहुत अलग दिखता है। लार्वा में कई बड़े परिवर्तन होते हैं जिससे वह वयस्क में बदलता है। इस प्रक्रिया को कायांतरण कहते हैं। उदाहरण: मेंढक का जीवन चक्र: अंडा $\rightarrow$ टैडपोल (लार्वा) $\rightarrow$ वयस्क मेंढक। टैडपोल मछली जैसा होता है, गलफड़ों से श्वसन करता है, जबकि वयस्क फेफड़ों और त्वचा से श्वसन करता है। रेशम कीट का जीवन चक्र भी कायांतरण का उदाहरण है। 4. किशोरावस्था की ओर (Reaching the Age of Adolescence) किशोरावस्था (Adolescence): जीवन काल की वह अवधि जब शरीर में ऐसे परिवर्तन होते हैं जिनके फलस्वरूप जनन परिपक्वता (reproductive maturity) आती है। यह लगभग 11 वर्ष की आयु से शुरू होकर 18 या 19 वर्ष की आयु तक चलती है। यौवनारंभ (Puberty): किशोरावस्था का वह चरण जब जनन अंग कार्यशील हो जाते हैं और हार्मोनल परिवर्तनों के कारण शारीरिक परिवर्तन होते हैं। यौवनारंभ के दौरान होने वाले परिवर्तन: ऊंचाई में वृद्धि: किशोरावस्था के दौरान सबसे स्पष्ट परिवर्तन। शारीरिक आकृति में परिवर्तन: लड़कों में: कंधे चौड़े हो जाते हैं, मांसपेशियाँ अधिक विकसित होती हैं। लड़कियों में: कमर का निचला भाग चौड़ा हो जाता है। आवाज में परिवर्तन: लड़कों में: स्वर यंत्र (गला) बढ़ता है, आवाज भारी हो जाती है (आवाज फटना)। लड़कियों में: आवाज आमतौर पर उच्च तारत्व वाली होती है। पसीना और तेल ग्रंथियों की सक्रियता में वृद्धि: मुँहासे (pimples) का कारण बन सकती है। जनन अंगों का विकास: लड़कों में: वृषण और शिश्न पूर्ण विकसित हो जाते हैं, शुक्राणु उत्पादन शुरू हो जाता है। लड़कियों में: अंडाशय बड़े हो जाते हैं, अंडे परिपक्व होने लगते हैं और मासिक धर्म (menstruation) शुरू हो जाता है। मानसिक, बौद्धिक और भावनात्मक विकास: सोचने के तरीके में बदलाव, अधिक स्वतंत्र महसूस करना। हार्मोन (Hormones): ये अंतःस्रावी ग्रंथियों (endocrine glands) द्वारा रक्त में स्रावित होने वाले रासायनिक पदार्थ हैं जो शरीर में विभिन्न प्रक्रियाओं (जैसे वृद्धि, विकास, जनन) को नियंत्रित करते हैं। यौवनारंभ में हार्मोन की भूमिका: पुरुष हार्मोन (Testosterone): वृषण द्वारा स्रावित होता है, लड़कों में द्वितीयक लैंगिक लक्षणों (जैसे दाढ़ी-मूँछ आना, आवाज का भारी होना) के विकास को नियंत्रित करता है। महिला हार्मोन (Estrogen और Progesterone): अंडाशय द्वारा स्रावित होते हैं, लड़कियों में द्वितीयक लैंगिक लक्षणों (जैसे स्तनों का विकास) और मासिक धर्म चक्र को नियंत्रित करते हैं। पीयूष ग्रंथि (Pituitary Gland): यह अन्य ग्रंथियों को हार्मोन स्रावित करने के लिए उत्तेजित करने वाले हार्मोन उत्पन्न करती है, इसलिए इसे 'मास्टर ग्रंथि' भी कहते हैं। जनन स्वास्थ्य (Reproductive Health): किशोरावस्था के दौरान स्वस्थ रहने के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए: व्यक्तिगत स्वच्छता (Personal Hygiene): शरीर को स्वच्छ रखना महत्वपूर्ण है, खासकर जननांगों की सफाई। संतुलित आहार (Balanced Diet): वृद्धि और विकास के लिए पर्याप्त पोषक तत्वों वाला भोजन। शारीरिक व्यायाम (Physical Exercise): शरीर को फिट और स्वस्थ रखता है। नशीले पदार्थों से बचाव: ड्रग्स, शराब और धूम्रपान से दूर रहना चाहिए क्योंकि ये स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक हैं। यौन संचारित रोग (Sexually Transmitted Diseases - STDs): ऐसे रोग जो यौन संपर्क से फैलते हैं (जैसे सिफलिस, गोनोरिया, HIV/AIDS)। इनके बारे में जागरूकता और बचाव महत्वपूर्ण है। 5. वायु तथा जल प्रदूषण (Pollution of Air and Water) - (पर्यावरण जीव विज्ञान) प्रदूषण (Pollution): पर्यावरण में अवांछित और हानिकारक पदार्थों का मिलना, जिससे पर्यावरण दूषित हो जाता है और जीवों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। वायु प्रदूषण (Air Pollution): वायु में ऐसे पदार्थों की उपस्थिति जो मानव और अन्य जीवों के लिए हानिकारक हैं। वायु प्रदूषक (Air Pollutants): कार्बन मोनोऑक्साइड (CO): अपूर्ण दहन से, जहरीली गैस। कार्बन डाइऑक्साइड ($CO_2$): जीवाश्म ईंधन के जलने से, ग्रीनहाउस गैस। सल्फर डाइऑक्साइड ($SO_2$) और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड ($NO_2$): उद्योगों और वाहनों से, अम्ल वर्षा का कारण। धुआँ और धूल कण: श्वसन संबंधी समस्याएँ पैदा करते हैं। क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs): रेफ्रिजरेटर और एयर कंडीशनर से, ओजोन परत का क्षरण करते हैं। वायु प्रदूषण के प्रभाव: मानव स्वास्थ्य पर: अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, फेफड़ों के रोग। अम्ल वर्षा (Acid Rain): सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड जैसी गैसें वर्षा जल के साथ मिलकर अम्ल बनाती हैं, जो इमारतों (जैसे ताजमहल), पौधों और जलीय जीवन को नुकसान पहुँचाती हैं। ग्रीनहाउस प्रभाव (Greenhouse Effect): कुछ गैसें (जैसे $CO_2$, मीथेन) पृथ्वी के वायुमंडल में गर्मी को रोक लेती हैं, जिससे पृथ्वी का तापमान बढ़ता है। यह प्राकृतिक प्रक्रिया है, लेकिन मानव गतिविधियों से इसका बढ़ना हानिकारक है। ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming): ग्रीनहाउस गैसों की बढ़ती सांद्रता के कारण पृथ्वी के औसत तापमान में वृद्धि। इससे ध्रुवीय बर्फ पिघल सकती है, समुद्र का स्तर बढ़ सकता है और जलवायु परिवर्तन हो सकता है। वायु प्रदूषण को कम करने के उपाय: सार्वजनिक परिवहन का उपयोग। जीवाश्म ईंधन के बजाय नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का उपयोग (सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा)। वाहनों में CNG जैसे स्वच्छ ईंधन का उपयोग। उद्योगों में फिल्टर और चिमनी का उपयोग। जल प्रदूषण (Water Pollution): जल निकायों (नदियों, झीलों, समुद्रों) में हानिकारक पदार्थों का मिलना, जिससे जल उपयोग के लिए अनुपयुक्त हो जाता है। जल प्रदूषक (Water Pollutants): सीवेज (Sewage): घरों और उद्योगों से निकलने वाला अपशिष्ट जल। इसमें रोगाणु और कार्बनिक पदार्थ होते हैं। औद्योगिक अपशिष्ट: उद्योगों से निकलने वाले जहरीले रसायन। कृषि रसायन: कीटनाशक, खरपतवारनाशक और उर्वरक जो वर्षा जल के साथ बहकर जल निकायों में पहुँचते हैं। जल प्रदूषण के प्रभाव: मानव स्वास्थ्य पर: हैजा, टायफाइड, पीलिया जैसे जल जनित रोग। जलीय जीवन पर: प्रदूषक जलीय जीवों को नुकसान पहुँचाते हैं और उनकी मृत्यु का कारण बन सकते हैं। सुपोषण (Eutrophication): उर्वरकों से पोषक तत्वों की अधिकता से शैवाल की अत्यधिक वृद्धि होती है, जिससे पानी में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है और जलीय जीव मर जाते हैं। जल प्रदूषण को कम करने के उपाय: सीवेज का उपचार करके ही जल निकायों में छोड़ना। औद्योगिक अपशिष्टों का उचित उपचार। कृषि में जैविक खादों का उपयोग। जल का विवेकपूर्ण उपयोग और संरक्षण। जल शोधन संयंत्रों का उपयोग। कक्षा 9: जीवन की मूलभूत इकाई और ऊतक (The Fundamental Unit of Life and Tissues) 1. जीवन की मूलभूत इकाई (The Fundamental Unit of Life) - कोशिका (Cell) कोशिका (Cell): सभी जीवित जीवों की संरचनात्मक (structural) और कार्यात्मक (functional) इकाई। यह जीवन की सबसे छोटी इकाई है जो स्वतंत्र रूप से कार्य कर सकती है। खोज (Discovery): रॉबर्ट हुक (Robert Hooke) ने 1665 में अपने स्वयं के बनाए सूक्ष्मदर्शी से कॉर्क (पेड़ की छाल) के पतले टुकड़े में मधुमक्खी के छत्ते जैसी संरचनाएँ देखीं और उन्हें 'कोशिका' नाम दिया। ल्यूवेनहॉक (Leeuwenhoek) ने पहली बार जीवित कोशिकाओं (जैसे बैक्टीरिया, शुक्राणु) का अवलोकन किया। कोशिका सिद्धांत (Cell Theory): श्लाइडन (Schleiden) (1838) और श्वान (Schwann) (1839) ने प्रतिपादित किया। मुख्य बिंदु: सभी जीव कोशिकाओं और कोशिका उत्पादों से बने होते हैं। कोशिका जीवन की मूलभूत इकाई है। विरचो (Virchow) ने बाद में जोड़ा: सभी कोशिकाएँ पूर्व-मौजूदा कोशिकाओं से उत्पन्न होती हैं (Omnis cellula e cellula)। कोशिका के प्रकार (Types of Cells): प्रोकैरियोटिक कोशिका (Prokaryotic Cell): इनमें सुस्पष्ट केंद्रक (well-defined nucleus) नहीं होता। आनुवंशिक सामग्री (DNA) कोशिका द्रव्य में बिखरी रहती है। कोई झिल्ली-बद्ध कोशिका अंग (membrane-bound organelles) नहीं होते। ये आमतौर पर छोटे और सरल होते हैं। उदाहरण: बैक्टीरिया (Bacteria), नीले-हरे शैवाल (Blue-green algae)। यूकैरियोटिक कोशिका (Eukaryotic Cell): इनमें एक सुस्पष्ट केंद्रक होता है जो केंद्रक झिल्ली (nuclear membrane) द्वारा घिरा होता है। इनमें झिल्ली-बद्ध कोशिका अंग (जैसे माइटोकॉन्ड्रिया, एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम) होते हैं। ये आमतौर पर बड़े और अधिक जटिल होते हैं। उदाहरण: पादप कोशिकाएँ, जंतु कोशिकाएँ, कवक, प्रोटिस्टा। कोशिका के मुख्य घटक और कार्य (Main Components and Functions of a Cell): कोशिका झिल्ली (Cell Membrane) / प्लाज्मा झिल्ली (Plasma Membrane): यह कोशिका की सबसे बाहरी परत है (पादप कोशिका में कोशिका भित्ति के अंदर)। यह लिपिड और प्रोटीन से बनी एक चयनात्मक पारगम्य झिल्ली (selectively permeable membrane) होती है, जिसका अर्थ है कि यह केवल कुछ पदार्थों को ही कोशिका के अंदर या बाहर जाने देती है। कोशिका को बाहरी वातावरण से अलग करती है और पदार्थों के आवागमन को नियंत्रित करती है। कोशिका भित्ति (Cell Wall): यह केवल पादप कोशिकाओं में पाई जाती है, कोशिका झिल्ली के बाहर। यह सेलूलोज से बनी एक कठोर, अजीवित परत है। पौधे को संरचनात्मक सहारा, सुरक्षा और अतिरिक्त कठोरता प्रदान करती है। कोशिका को फटने से बचाती है जब कोशिका पानी को अवशोषित करती है। केंद्रक (Nucleus): यह आमतौर पर कोशिका के केंद्र में स्थित होता है और कोशिका का नियंत्रण कक्ष होता है। यह एक दोहरी झिल्ली (केंद्रक झिल्ली) से घिरा होता है जिसमें केंद्रक छिद्र होते हैं। इसमें आनुवंशिक सामग्री (DNA) होती है, जो गुणसूत्रों (chromosomes) के रूप में व्यवस्थित होती है। कोशिका की वृद्धि, विभाजन और अन्य सभी गतिविधियों को नियंत्रित करता है। केंद्रक के अंदर एक छोटी संरचना केंद्रिका (nucleolus) होती है जो राइबोसोम के निर्माण में शामिल होती है। कोशिकाद्रव्य (Cytoplasm): यह कोशिका झिल्ली और केंद्रक के बीच का जेली जैसा पदार्थ है। इसमें जल, लवण, कार्बनिक अणु और विभिन्न कोशिका अंग (organelles) निलंबित रहते हैं। कोशिका के अधिकांश उपापचयी (metabolic) कार्य यहीं होते हैं। कोशिका अंग (Cell Organelles): एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम (Endoplasmic Reticulum - ER): झिल्लियों का एक नेटवर्क जो कोशिका द्रव्य में फैला होता है। चिकना ER (Smooth ER): लिपिड (वसा) और स्टेरॉयड हार्मोन के संश्लेषण में शामिल। खुरदुरा ER (Rough ER): इसकी सतह पर राइबोसोम होते हैं, जो प्रोटीन संश्लेषण और उनके परिवहन में शामिल होता है। गॉल्जी उपकरण (Golgi Apparatus) / गॉल्जी काय (Golgi Body): समानांतर रूप से व्यवस्थित थैलियों (सिस्टर्नी) का एक समूह। ER से आने वाले प्रोटीन और लिपिड को संशोधित (modify), पैक और वितरित करता है। लाइसोसोम के निर्माण में भी शामिल। माइटोकॉन्ड्रिया (Mitochondria): दोहरी झिल्ली वाली संरचनाएँ। आंतरिक झिल्ली मुड़ी हुई होती है (क्रिस्टी)। इन्हें 'कोशिका का पावरहाउस' (Powerhouse of the cell) कहा जाता है क्योंकि ये वायवीय श्वसन द्वारा ATP (एडेनोसिन ट्राइफॉस्फेट) के रूप में ऊर्जा उत्पन्न करते हैं। इनका अपना DNA और राइबोसोम होता है। प्लास्टिड (Plastids): ये केवल पादप कोशिकाओं में पाए जाते हैं और दोहरी झिल्ली वाले होते हैं। हरितलवक (Chloroplasts): हरे रंग के होते हैं क्योंकि इनमें क्लोरोफिल वर्णक होता है। प्रकाश संश्लेषण का स्थल। क्रोमोप्लास्ट (Chromoplasts): रंगीन होते हैं (हरे के अतिरिक्त), फूलों और फलों को रंग देते हैं। ल्यूकोप्लास्ट (Leucoplasts): रंगहीन होते हैं और भोजन (स्टार्च, तेल, प्रोटीन) का भंडारण करते हैं। रसधानी (Vacuoles): झिल्ली-बद्ध थैली जैसी संरचनाएँ। पादप कोशिकाओं में एक बड़ी केंद्रीय रसधानी होती है जो कोशिका के आयतन का 50-90% घेर सकती है। यह जल, अपशिष्ट उत्पादों और पोषक तत्वों का भंडारण करती है और कोशिका को स्फीति (turgidity) प्रदान करती है। जंतु कोशिकाओं में छोटी और कई रसधानियाँ हो सकती हैं, या अनुपस्थित हो सकती हैं। लाइसोसोम (Lysosomes): ये एकल झिल्ली वाली छोटी, गोलाकार थैलियाँ हैं जिनमें पाचक एंजाइम होते हैं। इन्हें 'आत्मघाती थैली' (Suicidal bags) कहा जाता है क्योंकि ये कोशिका के क्षतिग्रस्त या पुराने अंगों और बाहरी पदार्थों (जैसे बैक्टीरिया) को पचाते हैं। राइबोसोम (Ribosomes): ये झिल्ली रहित छोटे कण होते हैं जो ER पर या कोशिका द्रव्य में मुक्त रूप से पाए जाते हैं। इन्हें 'प्रोटीन फैक्ट्रियाँ' (Protein factories) कहा जाता है क्योंकि ये प्रोटीन संश्लेषण का स्थल हैं। तारककाय (Centrosome) और तारककेंद्र (Centrioles): मुख्य रूप से जंतु कोशिकाओं में पाए जाते हैं। कोशिका विभाजन के दौरान तर्कु तंतुओं (spindle fibers) के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। परासरण (Osmosis): यह एक अर्धपारगम्य झिल्ली (semi-permeable membrane) के माध्यम से जल के अणुओं का उच्च सांद्रता वाले क्षेत्र से निम्न सांद्रता वाले क्षेत्र की ओर गति करना है। कोशिका पर परासरण का प्रभाव: अल्पपरासारी विलयन (Hypotonic Solution): यदि कोशिका को ऐसे विलयन में रखा जाए जहाँ बाहर जल की सांद्रता कोशिका के अंदर से अधिक हो, तो जल कोशिका के अंदर चला जाएगा और कोशिका फूल जाएगी या फट जाएगी (जंतु कोशिका)। पादप कोशिका में कोशिका भित्ति के कारण कोशिका फटती नहीं बल्कि स्फीति हो जाती है। समपरासारी विलयन (Isotonic Solution): यदि कोशिका को ऐसे विलयन में रखा जाए जहाँ जल की सांद्रता अंदर और बाहर समान हो, तो जल का कोई शुद्ध प्रवाह नहीं होगा और कोशिका का आकार अपरिवर्तित रहेगा। अतिपरासारी विलयन (Hypertonic Solution): यदि कोशिका को ऐसे विलयन में रखा जाए जहाँ बाहर जल की सांद्रता कोशिका के अंदर से कम हो, तो जल कोशिका से बाहर निकल जाएगा और कोशिका सिकुड़ जाएगी (प्लास्मोलिसिस - पादप कोशिका में)। 2. ऊतक (Tissues) ऊतक (Tissue): कोशिकाओं का वह समूह जिनकी संरचना, उत्पत्ति और कार्य समान होते हैं। ये विशिष्ट कार्य करने के लिए एक साथ कार्य करते हैं। पादप ऊतक (Plant Tissues): विभज्योतक ऊतक (Meristematic Tissues): इन ऊतकों की कोशिकाएँ लगातार विभाजित होती रहती हैं। ये पौधे की वृद्धि के लिए जिम्मेदार होते हैं। स्थान के आधार पर प्रकार: शीर्षस्थ विभज्योतक (Apical Meristem): जड़ और तने के शीर्ष पर पाया जाता है, लंबाई में वृद्धि करता है। पार्श्व विभज्योतक (Lateral Meristem): तने और जड़ की परिधि में (मोटाई में) वृद्धि करता है (कैंबियम)। अंतर्वेशी विभज्योतक (Intercalary Meristem): पत्तियों के आधार और टहनियों के पर्व संधियों पर पाया जाता है, शाखाओं और पत्तियों की वृद्धि में मदद करता है। स्थायी ऊतक (Permanent Tissues): ये विभज्योतक ऊतकों से विकसित होते हैं और विभाजन की क्षमता खो चुके होते हैं। इनकी कोशिकाएँ एक विशिष्ट आकार, माप और कार्य करती हैं। प्रकार: सरल स्थायी ऊतक (Simple Permanent Tissues): ये एक ही प्रकार की कोशिकाओं से बने होते हैं। पैरेन्काइमा (Parenchyma): पतली कोशिका भित्ति वाली जीवित कोशिकाएँ। भोजन भंडारण (स्टार्च, प्रोटीन), प्रकाश संश्लेषण (क्लोरेन्काइमा), और जल भंडारण (एरेन्काइमा) का कार्य। कोलेन्काइमा (Collenchyma): कोनों पर मोटी कोशिका भित्ति वाली जीवित कोशिकाएँ। पौधे के अंगों को लचीलापन और यांत्रिक सहारा प्रदान करती हैं (बिना तोड़े मोड़ने की क्षमता)। स्क्लेरेन्काइमा (Sclerenchyma): लिग्निन के जमाव के कारण मोटी और कठोर कोशिका भित्ति वाली मृत कोशिकाएँ। पौधे को कठोरता, मजबूती और यांत्रिक सहारा प्रदान करती हैं (जैसे नारियल का बाहरी आवरण)। जटिल स्थायी ऊतक (Complex Permanent Tissues): ये एक से अधिक प्रकार की कोशिकाओं से बने होते हैं जो एक साथ मिलकर एक विशिष्ट कार्य करती हैं। इन्हें संवहन ऊतक (Vascular Tissues) भी कहते हैं। जाइलम (Xylem): जल और खनिज लवणों को जड़ों से पत्तियों और पौधे के अन्य भागों तक पहुँचाता है। इसमें वाहिकाएँ (vessels), ट्रैकिया (tracheids), जाइलम पैरेन्काइमा और जाइलम फाइबर होते हैं। फ्लोएम (Phloem): पत्तियों में बने भोजन को पौधे के अन्य भागों तक पहुँचाता है। इसमें चालनी नलिकाएँ (sieve tubes), सह कोशिकाएँ (companion cells), फ्लोएम पैरेन्काइमा और फ्लोएम फाइबर होते हैं। जंतु ऊतक (Animal Tissues): उपकला ऊतक (Epithelial Tissue): यह शरीर और अंगों की बाहरी सतहों को ढकता है और आंतरिक अंगों के अस्तर (lining) का निर्माण करता है। यह सुरक्षा, स्राव (secretion) और अवशोषण (absorption) का कार्य करता है। प्रकार: शल्की (squamous), घनाकार (cuboidal), स्तंभाकार (columnar), ग्रंथि (glandular), पक्ष्माभी (ciliated)। संयोजी ऊतक (Connective Tissue): यह शरीर के विभिन्न अंगों को जोड़ता है और सहारा प्रदान करता है। उदाहरण: रक्त (Blood): तरल संयोजी ऊतक, पदार्थों का परिवहन। हड्डी (Bone): कठोर और मजबूत, शरीर को ढाँचा और सहारा। उपास्थि (Cartilage): लचीला, हड्डियों के सिरों पर, नाक, कान में। कंडरा (Tendons): मांसपेशियों को हड्डियों से जोड़ते हैं। स्नायु (Ligaments): हड्डियों को हड्डियों से जोड़ते हैं। वसा ऊतक (Adipose Tissue): वसा का भंडारण, शरीर को इन्सुलेशन। एरिओलर ऊतक (Areolar Tissue): अंगों के बीच की जगह भरता है। पेशी ऊतक (Muscular Tissue): ये लंबी कोशिकाओं से बने होते हैं जिन्हें पेशी फाइबर कहते हैं। ये संकुचन और शिथिलन द्वारा गति और बल उत्पन्न करते हैं। प्रकार: ऐच्छिक पेशी (Voluntary Muscles) / कंकालीय पेशी (Skeletal Muscles): हमारी इच्छा से नियंत्रित होती हैं (जैसे हाथ और पैर की मांसपेशियाँ)। इनमें धारियाँ (striations) होती हैं, इसलिए इन्हें रेखित पेशी भी कहते हैं। अनैच्छिक पेशी (Involuntary Muscles) / चिकनी पेशी (Smooth Muscles): हमारी इच्छा से नियंत्रित नहीं होती हैं (जैसे आंतों, रक्त वाहिकाओं की दीवारें)। इनमें धारियाँ नहीं होती हैं, इसलिए इन्हें अरेखित पेशी भी कहते हैं। हृदय पेशी (Cardiac Muscles): यह केवल हृदय में पाई जाती है। अनैच्छिक होती है और लयबद्ध रूप से जीवन भर संकुचित और शिथिल होती रहती है। इनमें धारियाँ होती हैं और ये शाखित (branched) होती हैं। तंत्रिका ऊतक (Nervous Tissue): यह शरीर में संदेशों को संचारित करने के लिए जिम्मेदार होता है। न्यूरॉन (Neuron) / तंत्रिका कोशिका: यह तंत्रिका ऊतक की संरचनात्मक और कार्यात्मक इकाई है। भाग: कोशिका काय (cell body), डेंड्राइट (dendrites) (संदेश प्राप्त करते हैं), एक्सॉन (axon) (संदेश दूर ले जाते हैं)। यह मस्तिष्क, मेरुरज्जु और तंत्रिकाओं में पाया जाता है। 3. जीवों में विविधता (Diversity in Living Organisms) विविधता (Diversity): पृथ्वी पर पाए जाने वाले जीवों की विशाल संख्या और प्रकार। वर्गीकरण (Classification): जीवों को उनकी समानताओं और भिन्नताओं के आधार पर समूहों में व्यवस्थित करने की प्रक्रिया। यह जीवों का अध्ययन आसान बनाता है। वर्गीकरण के पदानुक्रम (Hierarchy of Classification) - कैरोलस लिनियस द्वारा: जगत (Kingdom): सबसे बड़ा समूह। संघ (Phylum) (जंतुओं के लिए) / प्रभाग (Division) (पौधों के लिए) वर्ग (Class) गण (Order) कुल (Family) वंश (Genus) जाति (Species): जीवों का सबसे छोटा और मूलभूत समूह, जिसमें आपस में प्रजनन कर सकने वाले जीव शामिल होते हैं। द्विपद नामकरण (Binomial Nomenclature): प्रत्येक जीव को दो भागों वाला वैज्ञानिक नाम दिया जाता है (वंश + जाति), जैसे मनुष्य का वैज्ञानिक नाम Homo sapiens है। पांच जगत वर्गीकरण (Five Kingdom Classification) - आर. एच. व्हिटेकर (R.H. Whittaker) द्वारा (1969): मोनेरा (Monera): प्रोकैरियोटिक (केंद्रक अनुपस्थित), एककोशिकीय। पोषण: स्वपोषी या विषमपोषी। उदाहरण: बैक्टीरिया, नीले-हरे शैवाल (सायनोबैक्टीरिया)। प्रोटिस्टा (Protista): यूकैरियोटिक (केंद्रक उपस्थित), एककोशिकीय। पोषण: स्वपोषी (प्रकाश संश्लेषण) या विषमपोषी। उदाहरण: अमीबा, पैरामीशियम, यूग्लीना, डायटम। कवक (Fungi): यूकैरियोटिक, बहुकोशिकीय (यीस्ट को छोड़कर)। पोषण: विषमपोषी (मृतजीवी - मृत कार्बनिक पदार्थों से पोषण)। कोशिका भित्ति काइटिन से बनी। उदाहरण: यीस्ट, मशरूम, मोल्ड। पादप (Plantae): यूकैरियोटिक, बहुकोशिकीय। पोषण: स्वपोषी (प्रकाश संश्लेषण)। कोशिका भित्ति सेलूलोज से बनी। उदाहरण: सभी प्रकार के पौधे। जंतु (Animalia): यूकैरियोटिक, बहुकोशिकीय। पोषण: विषमपोषी (भोजन का अंतर्ग्रहण)। कोशिका भित्ति अनुपस्थित। उदाहरण: सभी प्रकार के जंतु। पादप जगत का वर्गीकरण (Classification of Kingdom Plantae): थैलोफाइटा (Thallophyta): शरीर जड़, तना और पत्तियों में अविभेदित (थैलस जैसा)। संवाहन ऊतक अनुपस्थित। उदाहरण: शैवाल (Algae) - स्पाइरोगाइरा, यूलोथ्रिक्स, कारा। ब्रायोफाइटा (Bryophyta): पादप जगत के उभयचर (Amphibians of plant kingdom) - भूमि पर उगते हैं लेकिन प्रजनन के लिए जल की आवश्यकता होती है। शरीर जड़ जैसी संरचनाओं (राइजॉइड्स), तना और पत्ती जैसी संरचनाओं में विभेदित। संवाहन ऊतक अनुपस्थित। उदाहरण: मॉस (Moss), लिवरवर्ट्स (Liverworts)। टेरिडोफाइटा (Pteridophyta): शरीर जड़, तना और पत्तियों में विभेदित। संवाहन ऊतक (जाइलम और फ्लोएम) उपस्थित। बीज उत्पन्न नहीं करते (बीजरहित पौधे)। उदाहरण: फर्न (Ferns), हॉर्सटेल (Horsetails)। अनावृतबीजी (Gymnosperms): शरीर जड़, तना और पत्तियों में विभेदित। संवाहन ऊतक उपस्थित। नग्न बीज (Naked seeds) उत्पन्न करते हैं, अर्थात बीज फलों के अंदर बंद नहीं होते। उदाहरण: पाइन (Pine), साइकस (Cycas), देवदार (Deodar)। आवृतबीजी (Angiosperms): शरीर जड़, तना और पत्तियों में विभेदित। संवाहन ऊतक अत्यधिक विकसित। बीज फलों के अंदर बंद होते हैं (फूल वाले पौधे)। पादप जगत का सबसे बड़ा और सबसे विकसित समूह। प्रकार: एकबीजपत्री (Monocotyledons): बीज में एक बीजपत्र (cotyledon) होता है (जैसे गेहूँ, मक्का)। द्विबीजपत्री (Dicotyledons): बीज में दो बीजपत्र होते हैं (जैसे चना, आम)। जंतु जगत का वर्गीकरण (Classification of Kingdom Animalia) - मुख्य संघ (Phyla): पोरिफेरा (Porifera): 'छिद्रधारी जंतु' (Pore-bearing animals)। शरीर पर कई छिद्र होते हैं, जो जल को अंदर आने देते हैं। कोशिकीय स्तर का संगठन। उदाहरण: स्पंज (Sponges)। सीलेन्ट्रेटा (Coelenterata) / निडारिया (Cnidaria): शरीर द्विस्तरीय, खोखला। इनमें डंक मारने वाली कोशिकाएँ (cnidoblasts) होती हैं। उदाहरण: हाइड्रा (Hydra), जेलीफिश (Jellyfish), प्रवाल (Corals)। प्लैटीहेल्मिंथीस (Platyhelminthes): 'चपटे कृमि' (Flatworms)। शरीर पृष्ठ-अधर रूप से चपटा। अंग-स्तर का संगठन। उदाहरण: फीताकृमि (Tapeworm), प्लेनेरिया (Planaria)। निमेटोडा (Nematoda) / एस्केल्मिंथीस (Aschelminthes): 'गोल कृमि' (Roundworms)। शरीर बेलनाकार, बिना खंडों का। उदाहरण: एस्केरिस (Ascaris) / पेट के कृमि, फाइलेरिया कृमि। एनेलिडा (Annelida): खंडित शरीर वाले कृमि (Segmented worms)। शरीर खंडों में विभाजित। उदाहरण: केंचुआ (Earthworm), जोंक (Leech), नेरीस (Nereis)। आर्थ्रोपोडा (Arthropoda): जंतु जगत का सबसे बड़ा संघ। 'संधिपाद' (Jointed legs) वाले जंतु। शरीर सिर, वक्ष और उदर में विभाजित। बाह्य कंकाल काइटिन का बना होता है। उदाहरण: कीट (Insecta) - तिलचट्टा, मक्खी, मच्छर; मकड़ी (Arachnida), केकड़ा (Crustacea)। मोलस्का (Mollusca): कोमल शरीर वाले जंतु। शरीर पर कैल्शियम कार्बोनेट का कठोर कवच (shell) हो सकता है। उदाहरण: घोंघा (Snail), ऑक्टोपस (Octopus), सीप (Mussel)। एकाइनोडर्मेटा (Echinodermata): 'काँटेदार त्वचा' वाले जंतु। केवल समुद्री जीव। इनमें जल संवहन तंत्र (water vascular system) होता है। उदाहरण: सितारा मछली (Starfish), समुद्री अर्चिन (Sea Urchin)। कॉर्डेटा (Chordata): इनमें जीवन के किसी न किसी चरण में पृष्ठरज्जु (notochord) उपस्थित होती है। उप-संघ वर्टिब्रेटा (Vertebrata) / कशेरुकी: पृष्ठरज्जु रीढ़ की हड्डी (vertebral column) में बदल जाती है। मत्स्य (Pisces): केवल जल में रहते हैं। गलफड़ों से श्वसन। शरीर पर शल्क। उदाहरण: मछली। उभयचर (Amphibia): जल और भूमि दोनों पर रह सकते हैं। गलफड़ों, फेफड़ों और त्वचा से श्वसन। उदाहरण: मेंढक (Frog), सैलामैंडर (Salamander)। सरीसृप (Reptilia): भूमि पर रहते हैं। फेफड़ों से श्वसन। शरीर पर शल्क। अंडे देते हैं। उदाहरण: साँप (Snake), छिपकली (Lizard), मगरमच्छ (Crocodile)। पक्षी (Aves): उड़ने के लिए पंख और खोखली हड्डियाँ। फेफड़ों से श्वसन। अंडे देते हैं। उदाहरण: कबूतर (Pigeon), गौरैया (Sparrow)। स्तनधारी (Mammalia): बच्चों को जन्म देते हैं और उन्हें दूध पिलाते हैं। शरीर पर बाल। फेफड़ों से श्वसन। उदाहरण: मनुष्य (Human), गाय (Cow), व्हेल (Whale), चमगादड़ (Bat)। 4. हम बीमार क्यों पड़ते हैं? (Why Do We Fall Ill?) स्वास्थ्य (Health): यह केवल बीमारी की अनुपस्थिति नहीं है, बल्कि शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कल्याण की स्थिति है। रोग (Disease): शरीर के सामान्य कार्य में कोई भी गड़बड़ी या असामान्यता, जिससे व्यक्ति अस्वस्थ महसूस करता है। 'रोग' का अर्थ है 'असुविधा'। रोग के प्रकार (Types of Diseases): तीव्र रोग (Acute Diseases): ये कम अवधि के लिए होते हैं और तेजी से ठीक हो जाते हैं। इनका शरीर पर दीर्घकालिक प्रभाव कम होता है। उदाहरण: सामान्य जुकाम, फ्लू, टायफाइड। दीर्घकालिक रोग (Chronic Diseases): ये लंबी अवधि के लिए होते हैं और शरीर पर गंभीर, दीर्घकालिक प्रभाव डालते हैं। ये अक्सर पूरी तरह से ठीक नहीं होते या ठीक होने में लंबा समय लगता है। उदाहरण: मधुमेह (Diabetes), उच्च रक्तचाप (High Blood Pressure), कैंसर (Cancer), गठिया (Arthritis), टीबी (Tuberculosis)। रोग के कारण (Causes of Diseases): तत्काल कारण (Immediate Causes): वे कारक जो सीधे रोग उत्पन्न करते हैं। संक्रामक कारक (Infectious Agents): सूक्ष्मजीव जो शरीर में प्रवेश करते हैं और रोग उत्पन्न करते हैं। वायरस (Viruses): जुकाम, फ्लू, खसरा, पोलियो, AIDS। बैक्टीरिया (Bacteria): हैजा, टायफाइड, टीबी, टेटनस। कवक (Fungi): त्वचा संक्रमण (दाद), एथलीट फुट। प्रोटोजोआ (Protozoa): मलेरिया (प्लाज्मोडियम), अमीबी पेचिश (एंटअमीबा)। कृमि (Worms): फाइलेरिया, पेट के कृमि। गैर-संक्रामक कारक (Non-infectious Agents): आनुवंशिक असामान्यताएँ (Genetic Abnormalities): जैसे हीमोफीलिया, सिकल सेल एनीमिया। कुपोषण (Malnutrition): विटामिन या खनिज की कमी (जैसे आयरन की कमी से एनीमिया)। पर्यावरण कारक: प्रदूषण, विकिरण। जीवनशैली कारक: धूम्रपान, शराब का सेवन, व्यायाम की कमी (जैसे हृदय रोग, मधुमेह)। सहायक कारण (Contributory Causes): वे कारक जो रोग के होने की संभावना को बढ़ाते हैं। गरीबी, स्वच्छता की कमी, कुपोषण, टीकाकरण की कमी, कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली। संक्रामक रोगों का फैलाव (Spread of Infectious Diseases): वायु द्वारा (Air-borne): छींकने या खाँसने से निकलने वाली बूंदों से (जैसे जुकाम, टीबी, निमोनिया)। जल द्वारा (Water-borne): दूषित पानी पीने से (जैसे हैजा, टायफाइड, हेपेटाइटिस)। यौन संपर्क द्वारा (Sexually Transmitted Diseases - STDs): असुरक्षित यौन संबंध से (जैसे सिफलिस, गोनोरिया, HIV/AIDS)। वाहकों द्वारा (Vector-borne): जंतुओं (वाहकों) द्वारा रोगों के रोगाणुओं को एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुँचाना। उदाहरण: मच्छर (मलेरिया, डेंगू), मक्खी (हैजा, टायफाइड)। प्रत्यक्ष संपर्क द्वारा (Direct Contact): त्वचा से त्वचा के संपर्क से (जैसे दाद, खुजली)। रोगों की रोकथाम के सिद्धांत (Principles of Prevention of Diseases): सामान्य सिद्धांत (General Principles): स्वच्छता (Hygiene): व्यक्तिगत और सामुदायिक स्वच्छता बनाए रखना। स्वच्छ जल (Clean Water): पीने के लिए सुरक्षित पानी उपलब्ध कराना। संतुलित आहार (Balanced Diet): शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाए रखने के लिए। टीकाकरण (Vaccination): विशिष्ट रोगों के खिलाफ शरीर में प्रतिरक्षा विकसित करना। रोगवाहकों का नियंत्रण: मच्छरों और अन्य कीटों के प्रजनन स्थलों को नष्ट करना। विशिष्ट सिद्धांत (Specific Principles): टीकाकरण (Vaccination): यह शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को किसी विशिष्ट रोगाणु को पहचानने और उससे लड़ने के लिए तैयार करता है। जब कमजोर या मृत रोगाणुओं को शरीर में डाला जाता है, तो प्रतिरक्षा प्रणाली एंटीबॉडी बनाती है जो भविष्य में वास्तविक संक्रमण से लड़ती है। उदाहरण: पोलियो, खसरा, टेटनस, टीबी, हेपेटाइटिस के टीके। प्रतिरक्षा (Immunity): शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता। 5. प्राकृतिक संपदा (Natural Resources) - (पर्यावरण जीव विज्ञान) प्राकृतिक संपदा (Natural Resources): वे संसाधन जो प्रकृति में स्वतंत्र रूप से उपलब्ध हैं और मानव के लिए उपयोगी होते हैं (जैसे वायु, जल, मिट्टी, कोयला, पेट्रोलियम, वन)। वायु (Air) / वायुमंडल (Atmosphere): पृथ्वी को घेरने वाली गैसों की परत। संरचना: नाइट्रोजन (78%), ऑक्सीजन (21%), आर्गन (0.9%), कार्बन डाइऑक्साइड (0.03%) और अन्य गैसें। जीवन के लिए महत्व: ऑक्सीजन श्वसन के लिए, कार्बन डाइऑक्साइड प्रकाश संश्लेषण के लिए। वायु प्रदूषण: (कक्षा 8 में विस्तृत)। जल (Water): पृथ्वी की सतह का लगभग तीन-चौथाई भाग जल से ढका है। जीवन के लिए आवश्यक। जल चक्र (Water Cycle) / हाइड्रोलॉजिकल चक्र: जल का पृथ्वी की सतह, वायुमंडल और भूमिगत के बीच निरंतर संचलन। इसमें वाष्पीकरण, संघनन, वर्षा और अपवाह शामिल हैं। जल प्रदूषण: (कक्षा 8 में विस्तृत)। मिट्टी (Soil): पृथ्वी की सबसे ऊपरी परत जो पौधों की वृद्धि को सहारा देती है। मिट्टी का निर्माण: चट्टानों के अपक्षय (weathering) और जैविक पदार्थों के अपघटन से हजारों वर्षों में बनती है। मिट्टी के घटक: खनिज कण, ह्यूमस (जैविक पदार्थ), जल, वायु और सूक्ष्मजीव। मिट्टी प्रदूषण (Soil Pollution): कीटनाशक, उर्वरक, औद्योगिक कचरा आदि से मिट्टी का दूषित होना। मिट्टी का अपरदन (Soil Erosion): पवन या जल द्वारा मिट्टी की ऊपरी उपजाऊ परत का हटना। जैव-रासायनिक चक्र (Biogeochemical Cycles): विभिन्न रासायनिक तत्वों (जैसे नाइट्रोजन, कार्बन, ऑक्सीजन) का जैविक और अजैविक घटकों के बीच चक्रीय प्रवाह। नाइट्रोजन चक्र (Nitrogen Cycle): वायुमंडलीय नाइट्रोजन का नाइट्रेट और नाइट्राइट जैसे यौगिकों में परिवर्तन (नाइट्रोजन स्थिरीकरण)। पौधों द्वारा इन यौगिकों का अवशोषण। जंतुओं द्वारा पौधों को खाना। मृत जीवों और अपशिष्टों का अपघटन, जिससे नाइट्रोजन मिट्टी में वापस आ जाती है और फिर वायुमंडल में। कार्बन चक्र (Carbon Cycle): वायुमंडलीय $CO_2$ पौधों द्वारा प्रकाश संश्लेषण में उपयोग की जाती है। पौधों को जंतु खाते हैं। श्वसन और अपघटन से $CO_2$ वायुमंडल में वापस आती है। जीवाश्म ईंधन के जलने से भी $CO_2$ मुक्त होती है। ऑक्सीजन चक्र (Oxygen Cycle): वायुमंडलीय ऑक्सीजन श्वसन में उपयोग की जाती है। प्रकाश संश्लेषण द्वारा ऑक्सीजन वायुमंडल में मुक्त होती है। कक्षा 10: जीवन प्रक्रियाएँ, नियंत्रण एवं समन्वय, जनन, आनुवंशिकता और पर्यावरण (Life Processes, Control and Coordination, Reproduction, Heredity and Environment) 1. जैव प्रक्रम (Life Processes) जैव प्रक्रम (Life Processes): वे सभी क्रियाएँ जो एक जीव को जीवित रहने के लिए आवश्यक हैं (जैसे पोषण, श्वसन, परिवहन, उत्सर्जन, नियंत्रण एवं समन्वय, जनन)। पोषण (Nutrition): स्वपोषी पोषण (Autotrophic Nutrition): जीव अपना भोजन स्वयं बनाते हैं। प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis): हरे पौधों में (विस्तार से कक्षा 7 में)। विषमपोषी पोषण (Heterotrophic Nutrition): जीव भोजन के लिए दूसरों पर निर्भर रहते हैं। प्राणीसमभोजी (Holozoic): ठोस भोजन का अंतर्ग्रहण, पाचन, अवशोषण (मानव, अमीबा)। मृतजीवी (Saprotrophic): मृत और सड़े हुए पदार्थों से पोषण (कवक)। परजीवी (Parasitic): दूसरे जीवित जीव से पोषण (अमरबेल, जूँ)। मानव में पाचन तंत्र (Human Digestive System): (कक्षा 7 में विस्तृत) मुख $\rightarrow$ ग्रसनी $\rightarrow$ ग्रासनली $\rightarrow$ आमाशय $\rightarrow$ छोटी आँत $\rightarrow$ बड़ी आँत $\rightarrow$ मलाशय $\rightarrow$ गुदा। पाचक ग्रंथियाँ: लार ग्रंथियाँ, यकृत (पित्त रस), अग्न्याशय (अग्नाशयी रस)। एंजाइम: भोजन के जटिल अणुओं को सरल में तोड़ने वाले जैविक उत्प्रेरक। श्वसन (Respiration): भोजन से ऊर्जा मुक्त करने की प्रक्रिया। वायवीय श्वसन (Aerobic Respiration): ऑक्सीजन की उपस्थिति में। ग्लूकोज $\rightarrow$ पाइरुवेट (कोशिकाद्रव्य में) $\rightarrow$ $CO_2 + H_2O +$ ऊर्जा (माइटोकॉन्ड्रिया में)। अधिक ऊर्जा ($38 ATP$) उत्पन्न होती है। अवायवीय श्वसन (Anaerobic Respiration): ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में। यीस्ट में: ग्लूकोज $\rightarrow$ पाइरुवेट $\rightarrow$ एथेनॉल $+ CO_2 +$ ऊर्जा। मांसपेशियों में: ग्लूकोज $\rightarrow$ पाइरुवेट $\rightarrow$ लैक्टिक अम्ल $+$ ऊर्जा। कम ऊर्जा ($2 ATP$) उत्पन्न होती है। मानव में श्वसन तंत्र (Human Respiratory System): (कक्षा 7 में विस्तृत) गैसीय विनिमय: फेफड़ों में वायुकोष्ठिकाओं (alveoli) में होता है, जहाँ ऑक्सीजन रक्त में घुल जाती है और कार्बन डाइऑक्साइड रक्त से वायुकोष्ठिकाओं में आ जाती है। फेफड़ों की क्षमता: श्वसन आयतन, ज्वारीय आयतन। पौधों में श्वसन: रंध्रों, लेन्टिसेल और जड़ों से। परिवहन (Transportation): मानव में परिवहन: रक्त परिसंचरण तंत्र (Blood Circulatory System): हृदय, रक्त वाहिकाएँ (धमनी, शिरा, केशिकाएँ), रक्त। (कक्षा 7 में विस्तृत) दोहरा परिसंचरण (Double Circulation): मानव में रक्त हृदय से दो बार गुजरता है - एक बार फेफड़ों के लिए और एक बार शरीर के लिए। फुफ्फुसीय परिसंचरण (Pulmonary Circulation): हृदय $\rightarrow$ फेफड़े $\rightarrow$ हृदय। दैहिक परिसंचरण (Systemic Circulation): हृदय $\rightarrow$ शरीर के अंग $\rightarrow$ हृदय। लसिका तंत्र (Lymphatic System): लसिका, लसिका वाहिकाएँ और लसिका ग्रंथियाँ। यह ऊतक तरल पदार्थ को वापस रक्त में ले जाता है और प्रतिरक्षा में भूमिका निभाता है। पौधों में परिवहन: जाइलम (Xylem): जल और खनिज लवण का परिवहन (जड़ों से पत्तियों तक)। वाष्पोत्सर्जन खिंचाव (transpiration pull) द्वारा। फ्लोएम (Phloem): पत्तियों द्वारा संश्लेषित भोजन (शर्करा) का परिवहन (पौधे के सभी भागों तक)। स्थानांतरण (translocation) प्रक्रिया द्वारा। उत्सर्जन (Excretion): मानव में उत्सर्जन तंत्र (Human Excretory System): (कक्षा 7 में विस्तृत) वृक्क, मूत्रवाहिनी, मूत्राशय, मूत्रमार्ग। वृक्काणु (Nephron): वृक्क की संरचनात्मक और कार्यात्मक इकाई। यह रक्त का निस्पंदन (filtration) और पुनःअवशोषण (reabsorption) करके मूत्र बनाता है। पौधों में उत्सर्जन: वाष्पोत्सर्जन: पत्तियों से अतिरिक्त जल का निष्कासन। कुछ अपशिष्ट उत्पादों को पत्तियों में जमा कर लेते हैं और पत्तियाँ गिरने पर वे हट जाते हैं। राल (resins), गोंद (gums) जैसे पदार्थ पुराने जाइलम में जमा होते हैं। 2. नियंत्रण एवं समन्वय (Control and Coordination) नियंत्रण एवं समन्वय: शरीर के विभिन्न अंगों का एक साथ कार्य करना ताकि कोई भी क्रिया एक सुव्यवस्थित तरीके से हो सके। जंतुओं में नियंत्रण एवं समन्वय: तंत्रिका तंत्र (Nervous System): न्यूरॉन (Neuron) / तंत्रिका कोशिका: तंत्रिका तंत्र की संरचनात्मक और कार्यात्मक इकाई। यह विद्युत आवेगों (nerve impulses) के रूप में जानकारी संचारित करता है। संरचना: कोशिका काय (सायटॉन), डेंड्राइट (संदेश प्राप्त करते हैं), एक्सॉन (axon) (संदेश दूर ले जाते हैं)। सिनेप्स (Synapse): दो न्यूरॉन के बीच का जंक्शन जहाँ संदेश एक न्यूरॉन से दूसरे में न्यूरोट्रांसमीटर (रासायनिक संदेशवाहक) के माध्यम से स्थानांतरित होता है। केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (Central Nervous System - CNS): मस्तिष्क (Brain): शरीर का मुख्य नियंत्रण केंद्र। अग्रमस्तिष्क (Forebrain): विचार, स्मृति, भावनाएँ, ऐच्छिक क्रियाएँ (सेरिब्रम)। मध्यामस्तिष्क (Midbrain): दृष्टि और श्रवण प्रतिवर्त क्रियाएँ। पश्चमस्तिष्क (Hindbrain): सेरिबेलम (Cerebellum): शरीर का संतुलन, ऐच्छिक क्रियाओं का समन्वय। पॉन्स (Pons): श्वसन को नियंत्रित करता है। मेडुला ऑब्लोंगाटा (Medulla Oblongata): अनैच्छिक क्रियाएँ (जैसे हृदय गति, श्वसन, रक्तचाप, उल्टी)। मेरुरज्जु (Spinal Cord): मस्तिष्क से निकलने वाली तंत्रिकाओं का बंडल, प्रतिवर्ती क्रियाओं को नियंत्रित करता है और मस्तिष्क तक संदेश ले जाता है। परिधीय तंत्रिका तंत्र (Peripheral Nervous System - PNS): मस्तिष्क और मेरुरज्जु से निकलने वाली तंत्रिकाओं का नेटवर्क जो शरीर के बाकी हिस्सों से CNS को जोड़ता है। प्रतिवर्ती क्रिया (Reflex Action): उद्दीपन के प्रति एक तीव्र, स्वचालित और अनैच्छिक अनुक्रिया, जो मेरुरज्जु द्वारा नियंत्रित होती है। प्रतिवर्ती चाप (Reflex Arc): प्रतिवर्ती क्रिया के दौरान तंत्रिका आवेगों द्वारा तय किया गया मार्ग। इसमें संवेदी न्यूरॉन, रिले न्यूरॉन और प्रेरक न्यूरॉन शामिल होते हैं। उदाहरण: गर्म वस्तु को छूने पर हाथ हटाना। अंतःस्रावी तंत्र (Endocrine System): हार्मोन स्रावित करने वाली ग्रंथियों का नेटवर्क। हार्मोन रासायनिक संदेशवाहक होते हैं जो रक्त में सीधे स्रावित होते हैं और शरीर के दूरस्थ भागों पर कार्य करते हैं। मुख्य अंतःस्रावी ग्रंथियाँ और उनके हार्मोन: ग्रंथि हार्मोन कार्य पीयूष ग्रंथि (Pituitary) वृद्धि हार्मोन, TSH, FSH, LH अन्य ग्रंथियों को नियंत्रित करती है, वृद्धि। थायराइड ग्रंथि (Thyroid) थायरोक्सिन उपापचय दर, शारीरिक और मानसिक विकास। अधिवृक्क ग्रंथि (Adrenal) एड्रेनालिन तनाव की स्थिति में 'लड़ो या भागो' प्रतिक्रिया। अग्न्याशय (Pancreas) इंसुलिन, ग्लूकागन रक्त शर्करा का स्तर नियंत्रित करता है। वृषण (Testes) (पुरुषों में) टेस्टोस्टेरोन पुरुष लैंगिक लक्षण, शुक्राणु उत्पादन। अंडाशय (Ovaries) (महिलाओं में) एस्ट्रोजन, प्रोजेस्टेरोन महिला लैंगिक लक्षण, मासिक धर्म, गर्भावस्था। पौधों में नियंत्रण एवं समन्वय: पौधों में तंत्रिका तंत्र नहीं होता, लेकिन वे रासायनिक पदार्थों (हार्मोन) और वृद्धि गतियों द्वारा समन्वय करते हैं। पादप हार्मोन (Plant Hormones) / फाइटोहार्मोन (Phytohormones): ऑक्सिन (Auxin): कोशिका वृद्धि और दीर्घीकरण को बढ़ावा देता है, शीर्ष प्रभाविता (apical dominance) का कारण बनता है। जिबरेलिन (Gibberellin): तने की वृद्धि, बीज अंकुरण और फूलों के विकास को बढ़ावा देता है। साइटोकाइनिन (Cytokinin): कोशिका विभाजन को बढ़ावा देता है, पत्तियों को हरा रखने में मदद करता है। एब्सिसिक अम्ल (Abscisic Acid - ABA): वृद्धि अवरोधक, पत्तियों के गिरने (abscission) और बीज की सुप्तावस्था (dormancy) को बढ़ावा देता है। एथिलीन (Ethylene): गैसीय हार्मोन, फलों को पकाने (fruit ripening) में मदद करता है। पौधों की गतियाँ (Plant Movements): अनुवर्तन (Tropic Movements) / ट्रॉपिज्म (Tropism): उद्दीपन की दिशा की ओर या उससे दूर पौधों की वृद्धि संबंधी गतियाँ। प्रकाशानुवर्तन (Phototropism): प्रकाश की ओर वृद्धि (तना)। गुरुत्वानुवर्तन (Geotropism): गुरुत्वाकर्षण की ओर या उससे दूर वृद्धि (जड़ें गुरुत्वाकर्षण की ओर, तना उससे दूर)। जलानुवर्तन (Hydrotropism): जल की ओर वृद्धि (जड़ें)। रसायनुवर्तन (Chemotropism): रासायनिक उद्दीपन की ओर वृद्धि (पराग नली का बीजांड की ओर बढ़ना)। स्पर्शानुवर्तन (Thigmotropism): स्पर्श के प्रति अनुक्रिया (जैसे बेलों का सहारा लेकर ऊपर चढ़ना)। कम्पानुवर्तन (Nastic Movements) / नास्टी (Nasty): उद्दीपन की दिशा से स्वतंत्र गतियाँ। उदाहरण: छूई-मूई (Mimosa pudica) के पौधे की पत्तियों का छूने पर सिकुड़ जाना। 3. जीव जनन कैसे करते हैं? (How Do Organisms Reproduce?) जनन (Reproduction): जीव अपनी ही जैसी नई संतान उत्पन्न करते हैं। यह प्रजाति की निरंतरता सुनिश्चित करता है। DNA प्रतिकृति (DNA Replication): जनन का मूल आधार DNA की प्रतिकृति (copying) है। कोशिका विभाजन से पहले, DNA अपनी दो समान प्रतियाँ बनाता है। यह आनुवंशिक जानकारी को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरित करता है। प्रतिकृति के दौरान कुछ भिन्नताएँ (variations) उत्पन्न हो सकती हैं, जो जैव विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं। अलैंगिक जनन (Asexual Reproduction): एकल जनक से नई संतान उत्पन्न होती है। संतान आनुवंशिक रूप से जनक के समान होती है (क्लोन)। फायदे: तेजी से प्रजनन, केवल एक जनक की आवश्यकता। नुकसान: आनुवंशिक विविधता की कमी। तरीके (विस्तार से कक्षा 7 में): विखंडन (Fission): द्विखंडन (Binary Fission): एक जीव का दो समान भागों में बँटना (अमीबा, पैरामीशियम)। बहुखंडन (Multiple Fission): एक जीव का कई भागों में बँटना (प्लाज्मोडियम)। मुकुलन (Budding): जनक शरीर पर एक मुकुल का बनना (यीस्ट, हाइड्रा)। खंडन (Fragmentation): जीव का कई टुकड़ों में टूटकर प्रत्येक टुकड़े का नए जीव में विकसित होना (स्पाइरोगाइरा)। बीजाणु समासंघ (Spore Formation): बीजाणुओं द्वारा जनन (राइजोपस, फर्न)। कायिक प्रवर्धन (Vegetative Propagation): पौधों के कायिक भागों (जड़, तना, पत्ती) से नए पौधे का उगना (गुलाब, आलू, ब्रायोफिलम)। लैंगिक जनन (Sexual Reproduction): दो जनक (नर और मादा) भाग लेते हैं। नर युग्मक (gamete) और मादा युग्मक का संलयन होता है, जिससे युग्मनज बनता है। संतान आनुवंशिक रूप से दोनों जनकों से भिन्न होती है, जिससे विविधता आती है। फायदे: आनुवंशिक विविधता उत्पन्न करता है, जो अनुकूलन और जैव विकास के लिए महत्वपूर्ण है। नुकसान: धीमी प्रक्रिया, दो जनकों की आवश्यकता। पुष्पी पौधों में लैंगिक जनन: (कक्षा 7 में विस्तृत) पुष्प की संरचना: बाह्यदल, दल, पुंकेसर (नर जननांग), स्त्रीकेसर (मादा जननांग)। परागकण (Pollen Grains): पुंकेसर में बनते हैं, नर युग्मक होते हैं। बीजांड (Ovules): अंडाशय में होते हैं, मादा युग्मक (अंडा कोशिका) होते हैं। परागण (Pollination): परागकणों का परागकोष से वर्तिकाग्र तक स्थानांतरण (स्वपरागण, परपरागण)। निषेचन (Fertilization): पराग नली के माध्यम से नर युग्मक का बीजांड में प्रवेश करना और अंडा कोशिका से संलयन करना। युग्मनज (Zygote): निषेचन से बनता है, भ्रूण में विकसित होता है। बीज और फल का निर्माण: निषेचन के बाद, अंडाशय फल में विकसित होता है और बीजांड बीज में विकसित होते हैं। मानव में लैंगिक जनन: नर जनन तंत्र (Male Reproductive System): वृषण (Testes): शुक्राणु (sperms) और पुरुष हार्मोन (टेस्टोस्टेरोन) का उत्पादन करते हैं। शुक्रवाहिनी (Vas Deferens): शुक्राणु को वृषण से मूत्रमार्ग तक ले जाती है। शुक्राशय (Seminal Vesicles) और प्रोस्टेट ग्रंथि (Prostate Gland): शुक्राणु को पोषण देने वाला तरल पदार्थ (वीर्य) स्रावित करती हैं। शिश्न (Penis): वीर्य को मादा जनन पथ में स्थानांतरित करता है। मादा जनन तंत्र (Female Reproductive System): अंडाशय (Ovaries): अंडाणु (ova/eggs) और महिला हार्मोन (एस्ट्रोजन, प्रोजेस्टेरोन) का उत्पादन करते हैं। अंडवाहिनी (Oviduct) / फेलोपियन ट्यूब (Fallopian Tube): अंडाशय से अंडाणु को गर्भाशय तक ले जाती है। निषेचन आमतौर पर यहीं होता है। गर्भाशय (Uterus): भ्रूण का विकास यहीं होता है। योनि (Vagina): गर्भाशय ग्रीवा से बाहर तक का मार्ग। यौवनारंभ (Puberty): जनन अंगों का परिपक्व होना (कक्षा 8 में विस्तृत)। मासिक धर्म चक्र (Menstrual Cycle): महिलाओं में लगभग 28 दिनों का चक्र जिसमें अंडाशय से अंडाणु का निकलना (अंडोत्सर्ग) और गर्भाशय की परत का रक्तस्राव के रूप में निकलना शामिल है। निषेचन और गर्भावस्था (Fertilization and Pregnancy): शुक्राणु द्वारा अंडाणु का निषेचन आमतौर पर अंडवाहिनी में होता है। निषेचित अंडा (युग्मनज) गर्भाशय में प्रत्यारोपित होता है और भ्रूण में विकसित होता है। गर्भावस्था लगभग 9 महीने तक चलती है। प्रजनन स्वास्थ्य (Reproductive Health): गर्भनिरोधक विधियाँ (Contraceptive Methods): अनचाही गर्भावस्था को रोकने के तरीके (जैसे कंडोम, गर्भनिरोधक गोलियाँ, IUD, शल्य चिकित्सा)। यौन संचारित रोग (Sexually Transmitted Diseases - STDs): (कक्षा 9 में विस्तृत)। 4. आनुवंशिकता एवं जैव विकास (Heredity and Evolution) आनुवंशिकता (Heredity): लक्षणों का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में संचरण। विविधता (Variation): एक ही प्रजाति के सदस्यों के बीच पाई जाने वाली भिन्नताएँ। ये जनन (विशेषकर लैंगिक जनन) के दौरान या DNA प्रतिकृति में त्रुटियों के कारण उत्पन्न होती हैं। आनुवंशिक पदार्थ (Genetic Material): DNA (डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक अम्ल): यह अधिकांश जीवों में आनुवंशिक सामग्री है। यह एक डबल हेलिक्स संरचना है जिसमें आनुवंशिक जानकारी कोडित होती है। जीन (Gene): DNA का एक खंड जो किसी विशेष लक्षण (जैसे आँख का रंग) के लिए आनुवंशिक जानकारी रखता है। यह आनुवंशिकता की कार्यात्मक इकाई है। गुणसूत्र (Chromosomes): कोशिका के केंद्रक में पाई जाने वाली धागे जैसी संरचनाएँ, जो DNA और प्रोटीन से बनी होती हैं। ये आनुवंशिक जानकारी को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में ले जाती हैं। मानव में 23 जोड़े (46) गुणसूत्र होते हैं। मेंडल के आनुवंशिकता के नियम (Mendel's Laws of Inheritance) - ग्रेगर मेंडल (Gregor Mendel): मटर के पौधों पर अपने प्रयोगों के आधार पर आनुवंशिकता के तीन नियम दिए। प्रभाविता का नियम (Law of Dominance): जब एक विषमयुग्मजी (heterozygous) जीव में दो अलग-अलग एलील (gene के रूप) मौजूद होते हैं, तो केवल एक एलील (प्रभावी एलील) ही अपना प्रभाव दिखाता है, जबकि दूसरा (अप्रभावी एलील) छिपा रहता है। पृथक्करण का नियम (Law of Segregation): युग्मक निर्माण के दौरान, प्रत्येक जीन के दो एलील एक-दूसरे से अलग हो जाते हैं, ताकि प्रत्येक युग्मक में केवल एक एलील ही पहुँचे। स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम (Law of Independent Assortment): जब दो या दो से अधिक अलग-अलग लक्षणों का एक साथ वंशागति होती है, तो प्रत्येक लक्षण के एलील एक-दूसरे से स्वतंत्र रूप से युग्मकों में वितरित होते हैं। लिंग निर्धारण (Sex Determination): मानव में, लिंग गुणसूत्रों (sex chromosomes) द्वारा निर्धारित होता है। महिलाओं में XX गुणसूत्र होते हैं, और पुरुषों में XY गुणसूत्र होते हैं। मादा केवल X अंडाणु उत्पन्न करती है। नर X और Y शुक्राणु दोनों उत्पन्न करते हैं। यदि X शुक्राणु अंडाणु को निषेचित करता है, तो संतान XX (लड़की) होगी। यदि Y शुक्राणु अंडाणु को निषेचित करता है, तो संतान XY (लड़का) होगी। जैव विकास (Evolution): पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवों की आबादी में होने वाले क्रमिक और आनुवंशिक परिवर्तन, जिसके परिणामस्वरूप नई प्रजातियों का विकास होता है। चार्ल्स डार्विन (Charles Darwin): 'प्राकृतिक चयन का सिद्धांत' (Theory of Natural Selection) प्रस्तुत किया। प्राकृतिक चयन: प्रकृति उन जीवों का चयन करती है जो अपने पर्यावरण के लिए सबसे अच्छी तरह अनुकूलित होते हैं और जीवित रहने तथा प्रजनन करने की बेहतर संभावना रखते हैं। विकास के प्रमाण (Evidences of Evolution): जीवाश्म (Fossils): प्राचीन जीवों के चट्टानों में संरक्षित अवशेष। ये अतीत के जीवन रूपों के बारे में जानकारी प्रदान करते हैं और दिखाते हैं कि समय के साथ जीवन कैसे बदल गया है। समजात अंग (Homologous Organs): संरचना में समान (समान मूल योजना), लेकिन कार्य में भिन्न। ये समान पूर्वज से विकास का संकेत देते हैं (अपसारी विकास)। उदाहरण: मनुष्य का हाथ, घोड़े का अग्रपाद, व्हेल का फ्लिपर और चमगादड़ का पंख - सभी में हड्डियों की मूल संरचना समान है, लेकिन वे अलग-अलग कार्यों के लिए अनुकूलित हुए हैं। समरूप अंग (Analogous Organs): कार्य में समान, लेकिन संरचना में भिन्न (भिन्न मूल योजना)। ये समान पर्यावरण दबावों के कारण विकसित हुए हैं (अभिसारी विकास)। उदाहरण: कीट के पंख और पक्षी के पंख - दोनों उड़ने का कार्य करते हैं, लेकिन उनकी संरचना और विकास अलग-अलग हैं। अवशेषी अंग (Vestigial Organs): शरीर में ऐसे अंग जो अब कोई कार्य नहीं करते लेकिन पूर्वजों में कार्यात्मक थे (जैसे मानव में अपेंडिक्स)। भ्रूण विज्ञान (Embryology): विभिन्न जीवों के भ्रूणों की प्रारंभिक अवस्थाओं में समानताएँ विकासवादी संबंधों का सुझाव देती हैं। 5. हमारा पर्यावरण (Our Environment) पर्यावरण (Environment): हमारे चारों ओर जो कुछ भी है, जिसमें सभी सजीव और निर्जीव घटक शामिल हैं। पारितंत्र (Ecosystem): किसी विशेष क्षेत्र में रहने वाले सभी सजीव (जैविक घटक) और निर्जीव (अजैविक घटक) घटक एक साथ मिलकर कार्य करते हैं। जैविक घटक (Biotic Components): पौधे, जंतु, सूक्ष्मजीव। अजैविक घटक (Abiotic Components): तापमान, जल, वायु, मिट्टी, प्रकाश। पारितंत्र के घटक: उत्पादक (Producers): वे जीव जो प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपना भोजन स्वयं बनाते हैं (जैसे हरे पौधे, कुछ शैवाल)। उपभोक्ता (Consumers): वे जीव जो भोजन के लिए सीधे या परोक्ष रूप से उत्पादकों पर निर्भर रहते हैं। प्राथमिक उपभोक्ता / शाकाहारी (Herbivores): सीधे पौधों को खाते हैं (जैसे हिरण, गाय)। द्वितीयक उपभोक्ता / मांसाहारी (Carnivores): प्राथमिक उपभोक्ताओं को खाते हैं (जैसे शेर, साँप)। तृतीयक उपभोक्ता (Tertiary Consumers): द्वितीयक उपभोक्ताओं को खाते हैं (जैसे बाज)। सर्वाहारी (Omnivores): पौधे और जंतु दोनों खाते हैं (जैसे मनुष्य)। अपघटक (Decomposers): बैक्टीरिया और कवक जैसे सूक्ष्मजीव जो मृत पौधों और जंतुओं के कार्बनिक पदार्थों को सरल अकार्बनिक पदार्थों में तोड़ते हैं। ये पोषक तत्वों को चक्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। खाद्य श्रृंखला (Food Chain): यह दर्शाता है कि ऊर्जा किस प्रकार एक जीव से दूसरे जीव में स्थानांतरित होती है जब एक जीव दूसरे को खाता है। उदाहरण: घास $\rightarrow$ हिरण $\rightarrow$ शेर। खाद्य जाल (Food Web): कई खाद्य श्रृंखलाओं का एक जटिल, परस्पर जुड़ा हुआ नेटवर्क। यह अधिक यथार्थवादी है क्योंकि एक जीव अक्सर एक से अधिक प्रकार के भोजन पर निर्भर करता है। पोषण स्तर (Trophic Levels): खाद्य श्रृंखला में प्रत्येक चरण या स्तर। पहला पोषण स्तर: उत्पादक। दूसरा पोषण स्तर: प्राथमिक उपभोक्ता। तीसरा पोषण स्तर: द्वितीयक उपभोक्ता, आदि। 10% नियम (10% Law) - लिंडेमैन द्वारा: प्रत्येक क्रमिक पोषण स्तर पर ऊर्जा का केवल लगभग 10% ही अगले स्तर पर स्थानांतरित होता है, शेष 90% ऊर्जा उपापचय प्रक्रियाओं में उपयोग हो जाती है या गर्मी के रूप में खो जाती है। इसलिए, खाद्य श्रृंखला जितनी छोटी होगी, उतनी ही अधिक ऊर्जा उपलब्ध होगी। जैव आवर्धन (Biomagnification): खाद्य श्रृंखला के उच्च पोषण स्तरों पर गैर-जैव निम्नीकरणीय (non-biodegradable) रसायनों (जैसे DDT, पारा) की सांद्रता में वृद्धि। यह उच्च स्तर के उपभोक्ताओं के लिए बहुत हानिकारक हो सकता है। ओजोन परत (Ozone Layer): यह पृथ्वी के समताप मंडल (stratosphere) में स्थित ऑक्सीजन के तीन परमाणुओं ($O_3$) से बनी एक परत है। यह सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी (ultraviolet - UV) विकिरण को अवशोषित करके पृथ्वी पर जीवन की रक्षा करती है। ओजोन परत का अवक्षय (Ozone Layer Depletion): क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) जैसे मानव निर्मित रसायनों के कारण ओजोन परत पतली हो रही है, जिससे UV विकिरण पृथ्वी तक पहुँच रही है और त्वचा कैंसर, मोतियाबिंद और प्रतिरक्षा प्रणाली को नुकसान पहुँचा रही है। अपशिष्ट प्रबंधन (Waste Management): जैव निम्नीकरणीय अपशिष्ट (Biodegradable Waste): वे अपशिष्ट जो सूक्ष्मजीवों द्वारा प्राकृतिक रूप से अपघटित हो सकते हैं (जैसे फल और सब्जियों के छिलके, कागज)। अजैव निम्नीकरणीय अपशिष्ट (Non-biodegradable Waste): वे अपशिष्ट जो सूक्ष्मजीवों द्वारा अपघटित नहीं हो सकते और पर्यावरण में लंबे समय तक बने रहते हैं (जैसे प्लास्टिक, पॉलिथीन, धातुएँ, DDT)। अपशिष्ट निपटान के तरीके: पुनर्चक्रण (recycling), कंपोस्टिंग (composting), भस्मीकरण (incineration), लैंडफिल (landfill)। 6. प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन (Management of Natural Resources) प्राकृतिक संसाधन (Natural Resources): वे सभी पदार्थ और ऊर्जा स्रोत जो प्रकृति से प्राप्त होते हैं और मानव के लिए उपयोगी होते हैं (जैसे वायु, जल, मिट्टी, कोयला, पेट्रोलियम, वन)। संसाधनों के प्रबंधन की आवश्यकता: बढ़ती जनसंख्या और खपत के कारण, संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग और संरक्षण आवश्यक है ताकि भविष्य की पीढ़ियों के लिए उन्हें बचाया जा सके (सतत विकास)। 3 R's का सिद्धांत: कम उपयोग (Reduce): संसाधनों की खपत को कम करना (जैसे बिजली बचाना, पानी बचाना)। पुनः उपयोग (Reuse): वस्तुओं को फेंकने के बजाय बार-बार उपयोग करना (जैसे प्लास्टिक की बोतलों का फिर से उपयोग)। पुनर्चक्रण (Recycle): अनुपयोगी वस्तुओं को नई उपयोगी वस्तुओं में बदलना (जैसे प्लास्टिक, धातु, कागज का पुनर्चक्रण)। वन और वन्यजीव (Forests and Wildlife): वन: मूल्यवान संसाधन हैं जो लकड़ी, औषधियाँ, ऑक्सीजन प्रदान करते हैं और जलवायु को नियंत्रित करते हैं। वन्यजीव: वनों में रहने वाले जंतु। संरक्षण की आवश्यकता: वनों की कटाई (deforestation) और शिकार (poaching) से जैव विविधता (biodiversity) को नुकसान पहुँच रहा है। संरक्षण के उपाय: वनीकरण (afforestation), वनों की कटाई पर रोक, वन्यजीव अभयारण्य और राष्ट्रीय उद्यानों की स्थापना। जल संसाधन (Water Resources): जल संरक्षण: जल का विवेकपूर्ण उपयोग करना और उसे प्रदूषित होने से बचाना। वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting): वर्षा के जल को एकत्रित करना और उसे भविष्य में उपयोग के लिए संग्रहित करना। बाँध (Dams): जल को संग्रहित करने, सिंचाई, बिजली उत्पादन और बाढ़ नियंत्रण के लिए बनाए जाते हैं। कोयला और पेट्रोलियम (Coal and Petroleum): ये जीवाश्म ईंधन (fossil fuels) हैं जो लाखों वर्ष पहले मृत जीवों के अवशेषों से बने हैं। ये अनवीकरणीय संसाधन हैं और सीमित मात्रा में उपलब्ध हैं। इनके जलने से वायु प्रदूषण होता है और ग्रीनहाउस गैसें निकलती हैं। वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत: सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जलविद्युत ऊर्जा, भूतापीय ऊर्जा का उपयोग करके इन संसाधनों पर निर्भरता कम करनी चाहिए।